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संघर्षशील कामगार

काम कर रहे है दिन रात वो
कर रहे राष्ट्र प्रगति का कार्य वो भी
बनाते हैं ऊंची ऊंची इमारतें
लेकिन बिना छत सो रहे है वो भी।।

है अरमान दिल में उनके भी
है घर में घरवाले उनके भी
आती है जब कंपकंपाती सर्दी
ठिठुरन होती है उनको भी।।

छोटे छोटे मासूम है उनके भी
आंखों में आंसू है उनके भी
लगता है ऐसा अब एक अदद
आशियाने की ज़रूरत है उनको भी।।

हंसते रोते रहते है वो दिनभर
मिट्टी में खेलते रहते है दिनभर
तेज़ धूप, ठंड, आंधियों को भी
सहते है धूल से सने मासूम दिनभर।।

मुश्किल है ढारों में रहना सर्द रातों में
जाने वो कैसे रह पाते होंगे
दूर रहते है परिवारों से बरसों
उनको भी तो अपने याद आते होंगे।।

उनको कोई सुविधाएं नहीं
वो खुले में ही नहाते होंगे
देखते है उनके बच्चे जब, दूसरे
बच्चों को खिलौनों से खेलते हुए,
वो भी तो खेलना चाहते होंगे।।

है वो संघर्षशील हमेशा लेकिन
कभी तो वो भी थक जाते होंगे
आराम करने का मन होता होगा
लेकिन फिर भी काम पर जाते होंगे।।

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Author
कवि एवम विचारक

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