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शिरडी यात्रा

शिरडी यात्रा

उनको तो कोई काम बोलो ठीक से होता ही नही ।
हर बार कोई न कोई गड़बड़ी जरूर करते है।
तो गड़बड़ी ये हुई थी कि ट्रेन का समय सुबह 9 बजे का था और हम रात को 9 बजे स्टेशन पहुँचे,वहां जाकर पता चला कि ये ट्रेन तो सुबह 9 बजे की है ।
अब क्या वो ट्रेन जा चुकी थी ये भी नही की अभी अभी छुटी हो और हम उसे किसी स्टेशन में जाकर अपनी सीट ले ले ।
रिजर्वेशन भी किया पर कोई मतलब नही हुआ।
उदास होकर स्टेशन से बाहर आकर सड़क किनारे में खड़े खड़े सोच रहे..! की अब क्या किया जाए,दरसल सोच नही बड़बड़ा ही रहे थे।
उनको तो कोई काम बोलो ठीक से होता ही नही ।

वो ट्रेन तो हमसे छूट गई थी,अब सब घर जाने की सोच रहे थे हमने कहा एक तो बड़ी मुश्किल से कहि जाने का मौका मिला
और जीवन मे पहली बार इतनी दूर का सफर तय करना था खुश थे पर सब चौपट हो गया ।

सब ने कहा चलो समान ले लो चलते है ।
मैंने पूछा कहा..?
जवाब आया .. घर
मैंने कहा नही हम घर नही शिरडी ही जायेंगे..!
अगली ट्रेन कब है ! मैं पूछ कर आती हूँ..?
रुको मैं पूछ कर आता हूं .
तुम तो रहने ही दो .. कुछ का कुछ और ही सुन आओगे।
अच्छा मेरे साथ चलो ।
जाकर पूछा आज यहां से अभी और ट्रेन शिरडी को कितने समय है ?
जवाब दिया नही मेमे . अब कोई ट्रेन नही है यहां से
फिर मैंने कहा तो कहा से मिलेगी तो उन्होंने बताया आप सीधे नागपुर से ट्रेन ले सकती हो वो लोकल ट्रेन होगा ।
तुरन्त टिकट मिल जाएगा ।
फिर नागपुर के लिए टिकट बुक कर दो कहा ?
जवाब आया . नही मेमे नागपुर के लिए यहां से कोई ट्रेन नही है ।
फिर हम सब स्टेशन में बैठकर सोचने लगे ।
फिर क्या उन्होंने कहां अगर जाने का मन बना ही लिए है तो यहां से अगले स्टेशन में चलते है । फिर आगे सोचेगे।

वहाँ से निकल गए अगले स्टेशन में उतरकर भी हमे नागपुर के लिए ट्रेन नही मिली न ही शिरडी के लिए ।
अब हमारा सब का ध्यान शिरडी नही सिर्फ नागपुर था। सब पता कर लिया । पर कुछ हुआ नही फिर वही बैठे एक दम्पति ने हमे बताया हमे भी नागपुर जाना है । अब ट्रेन नही है तो हम बस से जा रहे है । तो हमने भी बस से जाने का मन बना लिया
नही ठान लिया चलो सब समान लो और उस दम्पति के साथ बस स्टैंड को निकल गए रिक्सा लिया रिक्से वाले ने 200 200 सौ ले लिए हमने बिना कोई बारगिंग किये पैसे दे दिए ।
बस मिल गई बर्थ ले लिया और दो नीचे की सीट मिल गई।
अब नागपुर पहुच गए । वहां पहुचकर पता चला कि शिरडी के लिए ट्रेन आधा घन्टा लेट है । तो सुन कर जान में जान आई
अब टिकट काउंटर भी खुल गया था पर सीट नही मिली वेटिंग था 100 लोगो का। फिर क्या चलो खड़े खड़े चले जायेंगे।
फिर जैसे ही ट्रेन आने वाली थी 15 मिनट पहले अलॉसमेन्ट हुआ …
भाग के एक आदमी हमारी तरफ़ आया कहा आप को सीट चाहिए तो आप को पैसे देने पड़ेगे मै आप को सीट दिला दूँगा
उन्होंने कहा ठीक है पहले सीट दिला फिर पैसे देगे ।
और क्या ट्रेन आया.. वो आदमी एक 9 साल के लड़के के साथ था चलती ट्रेन में आपातकाल वाला खिड़की खोल दिया
जो लाल कलर में होती है वही उसके सभी पार्ट खुल जाते है।
और अंदर जाने का जगह बन जाता है ।उस लड़के को उस खिड़की से अंदर भेज कर सीट रख लिया । और वो लड़का
उस खिड़की से अंदर कूदकर लोगो की गोद मे या उनके ऊपर जा गिरा क्यो की वो बोगी में कुछ लोग थे जो खिड़की के पास बैठे थे। हम को सीट मिल गई हम ने उसे पैसे दे दिए ।
और सीधा शिरडी तो नही हम कोपरगाव में उतरे डारेक्ट तो पहले शिरडी नही जाती थी ट्रेन तो कोपरगाव से उतरन कर
गाड़ी बुक कर ली और शिरडी पहुच गए।
आते वक्त हमने अपने सिजर्वेशन गाड़ी से वापस आये पर क्या वो हमारी सीट किसी और को दे दिए थे । फिर टीटी को खूब
सुना दिया फिर टीटी ने अगले बोगी में हमे जगा दे दिया।
हमने कहा हमने एक ही में सब को जगा चाहिए तो ऐसा सीट देना जो आप ने किसी और को दे दिया हमारा सीट वैसा ही फिर क्या था । टीटी ने सीट खाली करा कर सब को सीट और सोने के लिए बर्थ भी मिल गया। वो भी अपने सामने जैसे हमने बुक किया था । हम शांत हो गए छोड़ो यार सीट तो मिल गई ।
सब अच्छा अच्छा हुआ पर मुश्किल बहुत आई पर कहते है ना
अगर कोई चीज़ ठान लो तो फिर उसे पूरा करने में ईश्वर भी आप के साथ होता है।और यही हमारे साथ भी हुआ ।

अगर सब अच्छा अच्छा होता तो शायद ये सफर कभी याद ही नही होता ये सफर जीवन का अहम याद रहने वाला सफर बन
गया हम सब लोगो के लिए । और भी बहुत कुछ था पर अभी
बस इतना ही।

हँसते रहे मुस्कुराते रहे और मेरी रचनाओं को अपना प्यार देते रहे ।

©® प्रेमयाद कुमार नवीन
जिला – महासमुन्द (छःग)
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Chhattisgarh (MSD) नाम - नवीन कुमार साहू स्टेट्स - सिंगल स्वतंत्र लेखक जन्मतिथि - 24/04/1989 पढ़ाई - BSC . MA.sansakrit .

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