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ये कैसा अंदाज़ है उसका

ये कैसा अंदाज़ है उसका
हर कोई कायल है जिसका

हट जाता है अंधेरा
आ जाता है सवेरा
दिख जाए जब भी
मुझे वो महबूब मेरा।।

ये कैसा अंदाज़ है उसका
हर कोई कायल है जिसका

छुप जाते है गम
खुश हो जाते है हम
मिलता है मुझसे
जब भी मेरा हमदम।।

ये कैसा अंदाज़ है उसका
हर कोई कायल है जिसका

गहना है सादगी उसका
आकर्षक है रूप उसका
हवा में फैली है जो खुशबू, दे रही
पास होने का आभास उसका।।

ये कैसा अंदाज़ है उसका
हर कोई कायल है जिसका

आंखों में है नूर उसके
रह नहीं पाते हम दूर जिससे
हर कोई कायल है उसका
पूछो तुम हज़ूर जिससे।।

ये कैसा अंदाज़ है उसका
हर कोई कायल है जिसका

आता है जब महफिल में
खींचता है ध्यान सबका
रौनक बढ़ जाती महफिल की
चेहरा देता है बयान सबका।।

ये कैसा अंदाज़ है उसका
हर कोई कायल है जिसका

लेकर आता है ताज़गी फूलों की
चुरा लाता है शायद खुशबू उनकी
खिले गुलशन को साथ लेकर है चलता
पतझड़ में भी दिख रही बहार उसकी।।

ये कैसा अंदाज़ है उसका
हर कोई कायल है जिसका

दिल देता नहीं वो किसी को
बस दिल लूट लेता है सबका
उसकी अदाओं के जाल में
ये जहां फस चुका है कबका।।

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Author
कवि एवम विचारक

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