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मैं तो सड़क हूँ,…

मैं तो सड़क हूँ,…
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मैं तो सड़क हूँ, मुझे जाम न करो ,
यूंँ ही खुलेआम बदनाम न करो…

मेरी परेशानियों से तो सब ही वाकिफ़ है ,
जानकर भी अनजान सा क्यों मुखालिफ है ।
मेरे रास्ते पर ही सरपट दौड़े चले आते हैं ,
अजन्मा सा गर्भ हो,या कफन में लिपटे शव हो।
उम्मीदों के साये में बिलखते परिजन हो,
सांसों की घड़ी गिनता,कोई अंतिम क्षण हो।
रोजगार की खातिर भटकता तन मन हो ,
सबकी उम्मीदों से इस तरह खिलवाड़ न करो…

मैं तो सड़क हूँ, मुझे जाम न करो ,
यूँ ही खुलेआम बदनाम न करो…

देखो उधर,वो जो लड़की अकेली खड़ी है ,
शाम होने के भय से, वो जड़वत हुई है ।
निकली थी घर से वो जो,बेटी अब डरी है ,
मां घर में बिस्तर पे उसके,अकेली पड़ी है ।
दवा लाने को निकली थी, सहमी खड़ी है ,
कितनी बेबस वो दिखती,पर तुझे क्या पड़ी है ।
इनकी मजबूरी को दिल से समझा तो करो…

मैं तो सड़क हूँ, मुझे जाम न करो,
यूँ ही खुलेआम बदनाम न करो…

सीना छलनी है मेरा,वाहनों की रफ्तार से ,
दिल धड़कता है मेरा धूप हो या बरसात हो ।
दुख का दामन उठाये मैं अविचल रहा ,
सबकी परेशानियों को हरना ही मकसद मेरा ।
कैसे समझोगे अब तुम मेरी ये व्यथा ,
जब जलाओगे अग्नि से मेरी ही चिता ।
यूँ खुलेआम मेरा,कत्लेआम न करो…

मैं तो सड़क हूँ, मुझे जाम न करो ,
यूँ ही खुलेआम बदनाम न करो…

माना तेरी भी, अपनी मजबूरियां हैं ,
पर हठ करने को क्यों, ये ही पगडंडियाँ हैं ।
सत्य-अहिंसा से ये सब तो हासिल करो ,
भूखे धरने पे घर में ही बैठा करो ।
मेरे कलेजे पर चलकर मंजिल को बढ़ो ,
सितम से निपटने को,अब तुम सितम न करो ।
मेरे दामन में यूँ ही, कालिख मत धरो…

मैं तो सड़क हूँ, मुझे जाम न करो ,
यूँ ही खुलेआम बदनाम न करो…

ये तेरे हाथों में, क्या देख रहा हूँ मैं ,
लाठी,डंडा,भाला-बरछी और बहुत कुछ ।
क्या यही सब, बापू का हथियार था ,
क्या इन सब के लिए देश आजाद हुआ।
इतनी गरमी ही थी, यदि तन-बदन में ,
हमलावरों को क्यों आने दिया इस वतन में ।
लगा के माथे पर कलंक का ये टीका ,
अखण्डभारत को क्यों खण्डित होने दिया चमन में।
मैं ही देश की रफ्तार हूँ, अवरुद्ध मत करो,
मुझ निर्दोष पर,देशद्रोह का इल्ज़ाम न धरो…

मैं तो सड़क हूँ, मुझे जाम न करो,
यूँ ही खुलेआम बदनाम न करो…

मौलिक एवं स्वरचित
सर्वाधिकार सुरक्षित
© ® मनोज कुमार कर्ण
कटिहार ( बिहार )
तिथि – १२ /१०/२०२१
मोबाइल न. – 8757227201

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मनोज कुमार "कर्ण" "क्यों नहीं मैं जान पाया,काल की मंथर गति ? क्यों नहीं मैं समझ पाया,साकार की अंतर्वृत्ति ? मोह अब कर लो किनारा,जिंदगी अब गायेगी । सत्य खातिर…

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