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“मन के आंगन में”

मन के आंगन में
उग आया है पेड़ कोई।
पीत पात से गिर रहे,
असंख्य स्मृति के पल कई।
वो रीता रीता सा सावन,
भीग रहा सूना आंगन।
कोई दादुर बोले ना कोई मोर,
केवल बारिश का है शोर।
झूला झूल रहा है एकाकी,
यादों की पींग छपाकी।
बीते बरस था कैसा सावन,
कजरी के संग मनभावन।
अब तो आ जाओ भीगे नयन,
इस मन को बना दो मधुबन।
स्मृति के बादल से उठता,
ये गर्जन मन को डसता।
देखो मन के आंगन में,
उग आया है पेड़ कोई।
यहां पीत पात से गिर रहे,
असंख्य स्मृति के पल कई।
© डा०निधि श्रीवास्तव “सरोद”

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"हूँ सरल ,किंतु सरल नहीं जान लेना मुझको, हूँ एक धारा-अविरल,किंतु रोक लेना मुझको"

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