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बेटियाँ

“नींव है परिवार,आँगन,जोड़ती है बेटियां,
पर कही अपने ही हक़ को जूझती है बेटियां।
शोर सन्नाटे का,पत्थर पर उभरते नक्श सी,
पंख लेकर आसमां को,चीरती है बेटियां।
अंश,वारिस की लड़ाई में, कभी चुपचाप सी,
कोख से अपने ही हक़ को,मांगती है बेटियां।
चाक पर गीली सी, मिट्टी की तरह चढ़ती हुई,
सब रिवाजों को अकेले,बांधती है बेटियां।
वो कलम,कागज,किताबें,थामकर लड़ती है जब
वर्जनाओं की हदों को तोड़ती है बेटियाँ।
हौसलों से राह अपनी,खुद ही चुनती है मगर,
कांच सा अस्तित्व पाकर,टूटती है बेटियाँ।
देश की सरहद पर,दुश्मन को ये डंटकर मात दे
घर में अपने मान को ही ढूंढ़ती है बेटियाँ।
दे हर इक बेटी को अवसर,और दे अधिकार हम,
शान भारत की बनेंगी,बोलती है बेटियाँ।

Competition entry: "बेटियाँ" - काव्य प्रतियोगिता
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