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बेचैनियाँ

तेरी आंखों की बेचैनियों को,
जबसे मैंने देखा है
मैं जी कर भी जी नही पाती
बस तूझे अपना माना है।
खामोशियां अक्सर पूछती हैं मुझसे
क्या सबब है तेरी तन्हाइयों का
मैं हौले से मुस्कुरा देती हूं।
दिल ही दिल में तेरा नाम बता देती हूं।
गर होगा मेरे हाथों की लकीरों में तू
किस्मत हमारी जरूर रंग लाएगी
तेरी आंखों की ये बेचैनियां
हमारे दिलों को सुकून दे जाएंगी।

वैशाली💞
जकार्ता
26.11.2021

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मुझे हिंदी में काफी रूचि है. विदेश में रहते हुए हिन्दी तथा अध्यात्म की तरफ काफी रुझान हो गया. कविताएं पढ़ने, लिखने का शौक बचपन से था. अब फिर से…

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