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प्रेम के ऑंगन में ही जीना सीखा !

प्रेम के ऑंगन में ही जीना सीखा !
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जो प्रेम के ऑंगन में ही जीना सीखा ,
उसने ही प्रेम पे कुछ सवाल उठाया !
ओह ! ये कैसी हो गई ज़ालिम दुनिया,
मुझे कुछ भी नहीं ये समझ में आया !!

प्रेम की फुलवारी में थी जिसकी क्यारी ,
वो ही सुना रहे अपनी कथा कुछ न्यारी !
जब आई अपनी सेहत बनाने की बारी ,
तो उन्हें याद आ रही वो सारी ही क्यारी!!

अरे, प्रेम तो जीवन का वो शाश्वत सत्य है ,
जो खुद ही अपना आश्रय खोज लेती है !
उसे ज़बरदस्ती बिठाया न जा सकता कहीं ,
सच्चे मन से शुद्ध हृदय में प्रवेश कर लेती है!!

त्याग , तपस्या व पूर्ण समर्पण के बल पे ,
मनुज शाश्वत प्रेम की प्राप्ति कर पाता है !
जो निज स्वार्थ, लालच के चक्कर में होता ,
वह जीवन में सदा प्रेम से वंचित रह जाता है!!

औरों के लिए जो सर्वस्व ही कुर्बान करता ,
वह इस प्रेम का सुयोग्य पात्र बन जाता है !
अन्यथा कोई मुट्ठी भर धन एकत्रित करके ,
प्रेम बिना दुनिया को अलविदा कह जाता है!!

स्वरचित एवं मौलिक ।
सर्वाधिकार सुरक्षित ।
अजित कुमार “कर्ण” ✍️✍️
किशनगंज ( बिहार )
दिनांक : 07 नवंबर, 2021.
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Accountant, Civil Court at Kishanganj ( Bihar ) Qualifications : Post Graduation degree in Chemistry, From D. S. College, Katihar ( Bihar ) Hobby :- Thinking & Writing. Some poems…

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