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तेरी जरूरत

डॉ अरुण कुमार शास्त्री
एक अबोध बालक 💐 अरुण अतृप्त

तेरे रहते मुझे किसी बात का
शिकवा क्या है ।।
ढल गई रात ख़ुदाया
फजीता क्या है ।।
रोज़ रोज़ तो तुमसे
मुलाकात न हो पायेगी।।
तुम इसी बात पे झगड़ो गी
तो दोस्ती बिगड़ जायेगी ।।
मुझसे रुसवाई तेरी जुदाई
की एय सनम ।।
एक पल को भी
अब सही न जायेगी ।।
दर्द तेरे दिल का मेरी जान
जाने का सबब न बन जाये ।।
लौट आ के छोटा सा मिसरा
ग़ज़ल न बन जाये ।।
मुस्कुरा के टाल देना तू
सब गिला शिकवा ।।
तो जो बदली तो कहीं मेरा
मुकद्दर न बदल जाये ।।
आशिकी के नियम तफ़सील से
पढ़ लिया कीजिए।।
माशूक़ की मासूमियत से तो
न ख़फ़ा होइये ।।
तेरे रहते मुझे किसी बात का
शिकवा क्या है ।।
ढल गई रात ख़ुदाया
फजीता क्या है ।।

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मैं तो एक आवारा बादल हुँ एक अबोध बालक गलतियों से सीखता हुँ - अनघढ़ लेखक औघढ़ साहित्य अटपटा सा लेखक मगर जो कुछ हुँ आपका प्यार पाने के लिए…

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