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कलियुग की विषकन्याएँ…?

कलियुग की विषकन्याएँ…?
(नशा मुक्ति पर विशेष)
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कलियुग की जो विषकन्या है,
बच के रहना उससे यार।
दूर देश से उड़कर आयी ,
जहरीली मीठी ये बयार ।
ड्रग्स,कोकिन,हैरोइन खिला,
*रिया कर देती नैनों की वार।

कलियुग की जो विषकन्या है,
बच के रहना उससे यार !

उजले,काले,जहरीले विष से,
अभिशप्त हुआ सारा संसार।
युवावर्ग जो मंजिल पे जाते ,
उसपर ही करती है घाते।
नजरों से ये घायल कर देती ,
फिर करती मस्तिष्क बेकार।

कलियुग की जो विषकन्याएं है,
बच के रहना उससे यार!

दूर शहर से युवक जो आते,
कर्मपथ की मंजिल है पाते।
उसे मुहब्बत का नशा पिलाती,
अपनेपन का नाटक दिखलाती।
झूठे वादे में उलझाती,
धन-दौलत से बस रहता प्यार।

कलियुग की जो विषकन्या है,
बच के रहना उससे यार !

जब भी तुम रहो घर से दूर,
सत्य सादगी से हो भरपूर।
ताम-झाम से बच कर रहना,
क्लब,बार से तौबा करना।
बुरी संगत में मत फंसना तुम,
नशा मुक्ति से ,होगा उद्घार।

कलियुग की जो विषकन्या है,
बच के रहना उससे यार !

मौलिक एवं स्वरचित

© ® मनोज कुमार कर्ण
कटिहार ( बिहार )
तिथि – ३०/०६/२०२१
मोबाइल न. – 8757227201

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*रिया = दिखावा,प्रदर्शन
घाते = प्रहार, चोटें
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मनोज कुमार "कर्ण" "क्यों नहीं मैं जान पाया,काल की मंथर गति ? क्यों नहीं मैं समझ पाया,साकार की अंतर्वृत्ति ? मोह अब कर लो किनारा,जिंदगी अब गायेगी । सत्य खातिर…

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