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राम से बा बैर अब रावण के होता वंदगी।

राम से बा बैर अब रावण के होता वंदगी।
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आदमी से आजु देखीं जल रहल बा आदमी।
राम से बा बैर अब रावण के होता वंदगी।

पाठ – पूजा दूर अब चर्चो त नइखे राम के,
दाल रोटी म़े उलझिके रह गइल बा जिंदगी।

धर्म के धंधा बनाके भोग म़े सब लीन बा,
आदमी से आदमियत मिट गइल बा सादगी।

लोक – लज्जा ताक पर बा कागजी बा सभ्यता,
आजु हियरा म़े भरल बा गंदगी बस गंदगी।

अब दुशासन त समाइल लोग के हियरा तले,
देख लीं चहुंओर फइलल तीरगी बा तीरगी।

लोक भा परलोक के केहू के चिन्ता बा कहां,
नाम शोहरत के बदे अब मन भरल बा तिश्नगी।

हर तरफ अब स्वार्थ के पर्दा चढ़ल लउकत सचिन,
होत बा आपन भला अब का करी नेकी बदी।

✍️ पं.संजीव शुक्ल ‘सचिन’

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Author
D/O/B- 07/01/1976 मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है। Books: कुसुमलता (अभिलाषा नादान की)…

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