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माथ टिकुला सुबह के छटा हो गइल।

माथ टिकुला सुबह के छटा हो गइल।
केश करिया ई सवनी घटा हो गइल।

गोर सुग्घर बदन बा बिजुरिया नियन,
रूप निरखत रहीं रतजगा हो गइल।

नेह लागल बा तोहसे जुड़ाइल हिया,
मन खिलल खिन्नता सब दफ़ा हो गइल।

रात बीतल अन्हरिया चनरमा दिखल,
रौशनी से भरल पूर्णिमा हो गइल।

तू बसवलू सचिनवा के अँखियाँ तरे,
दर्र हियरा के सब अलविदा हो गइल।

✍️ पं.संजीव शुक्ल ‘सचिन’

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Author
D/O/B- 07/01/1976 मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है। Books: कुसुमलता (अभिलाषा नादान की)…

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