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मंगरु भैया कोरोना के सार बना लिहलें

मंगरू भैया श्रीबचन कहके ,कोरोना के सार बना लिहले।
केहू न जनले कब कोरोना के, बहिन से वियाह रचा लिहलें।
कोरोना मंगरु जीजा के ,पांव पखारे आइल बा।
हमारे दीदी के उ कैसे बाटें ,ई निहारे आइल बा।
देखते मंगरु भैया कोरोना के ,सड़सड़ा कहके भगा दिहलें।
मंगरू भैया श्रीबचन कहके ,कोरोना के सार बना लिहले।
कहलें मंगरु भैया ,ई किरोनवा त बहुरूपिया ह।
बची उहे ये सारे से ,जेकरे लगे बोराभर रुपिया ह।
पैसा वालन में कोरोना से बचले के ,झूठे आस जगा दिहलें।
मंगरू भैया श्रीबचन कहके ,कोरोना के सार बना लिहलें।
ये कोरोना सारे के ,न जाने केतना वैरिएंट हवे।
हमार सार ह हमहि जानब, ई केतना बड़ लंठ हवे।
ई का जाने एकर मंगरु जीजा, केतनन के पार लगा दिहलें।
मंगरू भैया श्रीबचन कहके ,कोरोना के सार बना लिहले।
-सिद्धार्थ गोरखपुरी

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अपने वक्त को एक आईना दिखा जाऊँगा। आज लिख रहा हूँ कल मैं लिखा जाऊँगा।। -सिद्धार्थ गोरखपुरी

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