· Reading time: 1 minute

बाप के फुर्सत मिले लइका खेलावे के

ई प्रगति सब झूठ बाटे बस दिखावे के।
अब कहाँ बा साँस की रिश्ता निभावे के।

जब मुबाइल ना रहल सबकी लगे देखीं,
बाप के फुर्सत मिले लइका खेलावे के।

दर्द से व्याकुल हृदय तड़पत रहेला अब,
लोग आपन ना मिले दुखड़ा सुनावे के।

लास की पीछे चलल ना चार को मनई,
ताक में जे भी रहल रुपिया बनावे के।

रोज महँगाई बढ़ेला आदमी लाचार,
फिक्र बाटे ‘सूर्य’ कइसे घर चलावे के।

#सन्तोष_कुमार_विश्वकर्मा_सूर्य

72 Views
Like

Enjoy all the features of Sahityapedia on the latest Android app.

Install App
You may also like:
Loading...