Read/Present your poetry in Sahityapedia Poetry Open Mic on 30 January 2022.

Register Now
· Reading time: 1 minute

पिया लाज लागता

झुरझुरी देहिया में कइसन, ई आज लागता,
जनि घूंघटा उठाईं पिया, लाज लागता,,

दुई चार दिन गिनत कटि जइहें समइया,
देह मन सगरी त रउरे हउवे सईंया,,
बथ्थत कपार मोर ऽ, बेहिसाब लागता,,
जनि घूंघटा उठाईं पिया, लाज लागता,,

सुति जाईं ओढ़ि के ओढ़नी चदरिया,
सगरी महीनवा त आवेला अजोरिया,
काहे दो गड़बड़ाइल अस, मिजाज लागता,,
जनि घूंघटा उठाईं पिया, लाज लागता,,

मानी कहनवा सरक जाईं तनिका,
छुई जनि हमके, रहीं तनि फरिका,
मुसुकी राउर बड़ा, दगाबाज लागता,,
जनि घूंघटा उठाईं पिया, लाज लागता,,
– गोपाल दूबे

63 Views
Like

Enjoy all the features of Sahityapedia on the latest Android app.

Install App
You may also like:
Loading...