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पटाखा और प्रदूषण

पटाखा उ वस्तु के नाम ह जेके पोंछी में आग लगावला से राउर ज़िंदगी में उ धमाका मचा देवे ला जेकरा से आपन लोग के त ख़ुशी मिली बाक़ी हो सकी की कहु के दुखो मिले। आज काल एगो चलन चल रहल बा की दोसर के पटाखा से प्रदूषण आ आपन पटाखा से आक्सीजन निकल रहल बा। का करीं समझ में ना आवता की कैसे समझवाल जाओ की लोग बुझे की चाहे दिवाली के चाहे ईद के चाहे क्रिसमस के चाहे नयका साल के चाहे शादी बियाह के ही काहे न हो पटाखा सिर्फ़ ख़राबी ही करेला। फिर भी लोग आपन-आपन पटाखा के आक्सीजन युक्त समझ के भड़का रहल बा।बक़ायदा वीडियो बना के संदेश दे रहल बा लोग की पटाखा फोड़ीं त फ़ोड़िं केहू का बोली बाक़ी ध्यान रखीं की आप अगला पीढ़ी के लोगन के क़ेतना नुक़सान करऽ तानी। अपने लोग खुदे महसूस करीं की 1990 से 2000 अ 2000 से 2020 तक मौसम में क़ेतना बदलाव आ गेल बा। गर्मी जाड़ा के ढंग बदल गेल बा।बरसात बिन मौसम के हो जाता आ मौसम में आइसन सूखा पड़ जाता की नल बोरिंग के साथ कंठ के थूक सुख जाता की फसल के पानी कैसे पियायीं। हम ई ना कहऽ तानी की ई सब ख़ाली पटाखा से होता बाक़ी एकरा में एकरो साझेदारी बा की ना बतायीं लोग। पूरा दुनिया जहान के लोग ई कोशिश में लगल बा की कैसे धरती के शुद्ध रखल जाओ आ ओकरा में अगर अपने लोग 0.00001% भी साझेदारी करऽ तानी त ई बहुत ग़लत बा।
अंत में एतना ही की ईगो छोड़ीं आ खुद के साथे-साथे लोगन के भी ई बतायीं की आपन लोग के बचावे वाला के साथ देवे के बा ना की मारे वाला के।

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हम लेखक तो मनमौजी हैं पर फूल और अंगार दोनों लिखने की कुव्वत रखते हैं।

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