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निर्गुण – एकदिन छोड़ि सगरो एहिजा चलि जईबा

देह दुनिया भरम ह बलवान करम गति,
भीतरी के सांच भीतरीये पहचान ले,,
बुद्धि कुबुद्धि के फेरा में उलझि मत,
नर सेवा ही सांचो नरायन जप मान ले,,

केतनो तू मंहगा घरवा सजईबा,
एकदिन छोड़ि सगरो एहिजा चलि जईबा,,

मनवा के मांजि धोई रखा तू साफ,
एकरे त करनी बस जाई तोहरे साथ,
पैसा से करम गति कीन नाहीं पईबा,,
एकदिन छोड़ि सगरो एहिजा चलि जईबा,,

नाता भरम के निबाहि लेबा तू कब ले,
माटी के खेलौना खेलौना बा जब ले,
फेरो राम नाम सत इहे पढ़ावल जईबा,,
एकदिन छोड़ि सगरो एहिजा चलि जईबा,,

दया धरम के जो खजाना भरि लेईबा,
जरूरत में केहू के कामे आइ जईबा,
राखा भरोस सोझा नरायन के पईबा,,
एकदिन छोड़ि सगरो एहिजा चलि जईबा,,

एहि किरदार के सांच नाही जाना,
माया क दोख ह ई एहि के पहचाना,
मौका बा मिलल मुकुत होइ जईबा,,
एकदिन छोड़ि सगरो एहिजा चलि जईबा,,
– गोपाल दूबे

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