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ना ना अइसन ना होई

बिना वजह तहके भुलवा दीं, ना ना अइसन ना होई।
जियते धड़कन सांस भुला दीं, ना ना अइसन ना होई।

प्यार मुहब्बत से भी आगे, दुनिया में कुछ अउरो बा,
तहरा खातिर जान गँवा दीं, ना ना अइसन ना होई।

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई, जब आपस में भाई हऽ,
मन्दिर मस्जिद मेल करा दीं, ना ना अइसन ना होई।

गलि से तहरी गुजरल हमहूँ, जिनगी भर अब छोड़ब ना,
मजनू के ठप्पा हटवा दीं, ना ना अइसन ना होई।

‌मुफ्त मिलेला मुर्गा दारू, खिंच के खूबे खाइल जाँ,
सेतिहा में ई वोट लुटा दीं, ना ना अइसन ना होई।

दू लइके की बाप क सीना, में का दिल नाहीं होला,
नैन बाण में जंग लगा दीं, ना ना अइसन ना होई।

खिसियाले मेहरारू कतनो, भाग के नइहर जाले ना,
ससुरारी में आग लगा दीं, ना ना अइसन ना होई।

सन्तोष कुमार विश्वकर्मा ‘सूर्य’

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