· Reading time: 1 minute

नाहीं जनलूऽ, पिरीतिया के मोल हो

नाहीं जनलूऽ, पिरीतिया के मोल हो।
हमरे जिनिगिये से, दीहलू तू तोल हो।।

दरदिया तनिको के, अखरत न हमके,,
हंसि के एक बेर देतू जो बोल हो।।

दिने दिन बढ़त जाता पापिन के जोरवा,
डर बा न जाए, धरती ई डोल हो ।।

तिल हवे गाल पे कि, विधना के काजर
कइसे कइल सुघड़ाई से गोल हो।।

गतर गतर मनसा के तोपबा तू केतनो
व्यवहार खोल देई सगरी के पोल हो।।

मीठे मीठ बोलत हवा एतना काहें,,
लागता भीतरी में बा कुच्छू झोल हो।।
– गोपाल दूबे

56 Views
Like

Enjoy all the features of Sahityapedia on the latest Android app.

Install App
You may also like:
Loading...