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धान कटाई (पेशा लोकगीत)

लोकभाषा/बोली :- ठेठ भोजपुरी

#भूमिका :- उक्त रचना में हमारे यहाँ तराई क्षेत्रों में पेशा लोकगीत के अन्तर्गत गाये जाने वाला धान कटाई गीत आप सभी के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास है।
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#रचना

चल काटे खेतवा किसनवा नु हो
चलऽ काटे तू खेतवा।

धनवा के बलिया, पीयर जइसे सोनवा।
बाटे छछनाइल देखीं हियरा के कोनवा।
देखि हरषाइल भुखा पेटवा नू हो,
चलऽ काटे तू खेतवा।।
चल काटे खेतवा किसनवा नु हो
चलऽ काटे तू खेतवा।।

अगहन मास कटनियां के दिनवा।
जङ्गरइतीन के खटनियां के दिनवा।
धनवा से बनिहें गहनवा नु हो
चलऽ काटे तू खेतवा।।
चल काटे खेतवा किसनवा नु हो,
चलऽ काटे तू खेतवा।।

कांच ही बांस के बनलऽ बखरिया।
पोरसा पुआल बदे बनलऽ बा घरिया।
गाय, गोरु बदे ई, लेहनवा नु हो
चलऽ काटे तू खेतवा।।
चल काटे खेतवा किसनवा नु हो
चलऽ काटे तू खेतवा।।

(पं.संजीव शुक्ल ‘सचिन’)
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#शब्दार्थ:- धनवा-धान, बलिया- धान की बाली, छछनाइल- अत्यधिक खुश होना, जङ्गरइतीन- मेहनतकश, घरिया- गाय, बैल का खटाल
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मैं [पं.संजीव शुक्ल ‘सचिन’] ईश्वर को साक्षी मानकर यह घोषणा करता हूँ कि मेरे द्वारा प्रेषित उपरोक्त रचना मौलिक, स्वरचित,अप्रकाशित और अप्रेषित है।

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Author
D/O/B- 07/01/1976 मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है। Books: कुसुमलता (अभिलाषा नादान की)…

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