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दहि गइल घरिया

दिल में दरद उठे खेत भइल दरिया,
कि का करीं अब जब दहि गइल घरिया।

सपना हमार बा भइल पानी पानी,
जिनिगी भइल जस बाढ़ में पालानी,
बहे कहीं लोर कहीं बरसे बदरिया-
कि का करीं अब जब दहि गइल घरिया।

लहरत फसिलिया के भइल दुरगतिया,
गँहुआ से भरल बखार भइल मटिया,
भुखवा पिअसिया से मुँह भइल करिया-
कि का करीं अब जब दहि गइल घरिया।

धनवा भिलाई गइल पुरुखन के धइल,
गइयो भँइसियो के बाढ़ लेइ गइल,
तड़पे करेज जइसे सुखले मछरिया-
कि का करीं अब जब दहि गइल घरिया।

– आकाश महेशपुरी
दिनांक- 10/08/2021

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संक्षिप्त परिचय : नाम- आकाश महेशपुरी (कवि, लेखक) मो. न. 9919080399 मूल नाम- वकील कुशवाहा जन्मतिथि- 15 अगस्त 1980 शैक्षिक योग्यता- स्नातक ॰॰॰ प्रकाशन- सब रोटी का खेल (काव्य संग्रह)…

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