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आदमी लाचार बा

२१२१ २१२२ २१२

आदमी देखीं बड़ी लाचार बा।
हौसला राखल इहाँ दरकार बा।

बा खजाना माल दौलत झूठ सब,
प्रेम ही तऽ जिंदगी के सार बा।

देह बा माटी क पिजड़ा जान लीं,
जिंदगी प्रभु के दिहल उपहार बा।

रोज महँगाई बढ़ेला आजकल,
हाय कइसन देख लीं सरकार बा।

हो गइल वापस बनल कानून जब,
फिर न जाने कौन अबहिन रार बा।

सन्तोष कुमार विश्वकर्मा सूर्य

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