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17 Sep 2024 · 1 min read

*मनः संवाद—-*

मनः संवाद—-
17/09/2024

मन दण्डक — नव प्रस्तारित मात्रिक (38 मात्रा)
यति– (14,13,11) पदांत– Sl

अपना पथ स्वयं बनाती, कभी नहीं रुकती नदी, उसका लक्ष्य नदीश।
घटता बढ़ता पखवाड़े, फिर भी महा प्रसन्न सा, लगता है रजनीश।।
जिसने सारे ग्रंथ लिखे, थके नहीं फिर भी कभी, कहते उसे कवीश।
अपनी थोड़ी प्रसिद्धि पर, इतराता अभिमान में, कलयुग का दसशीश।।

कोई भी नहीं सिखाता, रोते हैं कैसे यहाँ, हँसने की देते सीख।
रहे भुलक्कड़ कितना भी, लेकिन रहता याद है, शादी की तारीख।।
अच्छी बातें सुनते हैं, नहीं सुनाई दे कभी, पीड़ित की ही चीख।
मदद किये पर पुण्य मिले, चाहे कुछ भी हो मगर, नहीं माँगना भीख।।

— डॉ. रामनाथ साहू “ननकी”
संस्थापक, छंदाचार्य, (बिलासा छंद महालय, छत्तीसगढ़)
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