दीया में के तेल झुराइल

कइसन हाय दिवाली आइल।
दीया में के तेल झुराइल।

अच्छा दिन आवे आला बा,
तहरा कुछऊ बात बुझाइल।

शतक मारि के मोछि अँइठलस,
सबजी, तेल, दाल गरमाइल।

कवना फेरा में बारऽ हो,
मंदिर के बा नेव चँताइल।

चुल्हि उपासल कई दिनन से,
भारत विकसित भइल सुनाइल।

गदहा पूछे कतना पानी,
बड़-बड़ अदमी लोग दहाइल।

रोजगार के बात भइल तऽ
देशद्रोह में नाम लिखाइल।

‘सूर्य’ सुनऽ बदनाम हो जइबऽ,
तू काहें बारऽ अझुराइल।

सन्तोष कुमार विश्वकर्मा सूर्य

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