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30 May 2023 · 4 min read

😢स्मृति शेष / संस्मरण

😢स्मृति शेष / संस्मरण
■ जो हर किरदार में रहे दमदार
◆ भावपूरित श्रद्धासुमन पीसी सर को
【प्रणय प्रभात】
माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में मेरे शिक्षक रहे श्री पूरणचंद गुप्ता के देहावसान का दुःखद समाचार 3 साल पहले आज ही के दिन मिला। मेरे लिए यह एक व्यक्तिगत क्षति थी जिससे मेरा आहत होना स्वाभाविक था। एक शिक्षक से मार्गदर्शक मित्र तक की भूमिका में रहे स्व. श्री पीसी सर से मेरा लगाव बाल्यकाल से रहा। मैं अपने कस्बे के वार्षिक श्री रामलीला उत्सव का ज़बरदस्त दर्शक था और वे एक मंझे हुए कलाकार। उनके प्रति लगाव का अंकुरण रामतलाई के रामलीला मैदान से ही हुआ, जो कालांतर में एक वृक्ष का रूप धारण कर गया।
वाक़या 1970 के दशक का है। तब श्योपुर एक छोटा व शांत सा कस्बा था। यहां मनोरंजन के माध्यम नहीं के बराबर थे। लिहाजा एक महीने के श्री हजारेश्वर महादेव मेले के बाद एक पखवाड़े का श्री रामलीला समारोह अंचल भर में प्रसिद्ध था। समर्पित कलाकारों से सजे इस आयोजन में पीसी सर की लोकप्रियता भगवान श्री परशुराम के किरदार को लेकर थी। धनुष यज्ञ वाले प्रसंग के रोमांचक मंचन को देखने न केवल स्थानीय बल्कि क्षेत्र भर का जन सैलाब उमड़ पड़ता था। जनप्रिय कलाकार श्री राधेश्याम त्रिपाठी लक्ष्मण के रूप में सामने होते थे और दोनों के बीच रोचक व रोमांचक संवाद दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता था। नकद पुरुस्कारों की सिलसिलेवार घोषणा के बीच यह प्रसंग देर रात तक चलता था। माँ सीता की भूमिका उन दिनों श्री महावीर मंगल निभाते थे। जो कालांतर में लक्ष्मण बनने लगे। भगवान परशुराम की भूमिका तब भी पीसी सर के पास रही।
एक दिन की इस भूमिका के बाद पीसी सर महारानी कैकेई की भूमिका भी अदा करते थे। जो दशरथ मरण वाले प्रसंग में जान फूंक देती थी। डेढ़ से दो दशक बाद सर हनुमान जी की भूमिका में आ गए। जिसे बरसों तक श्री पूरणमल गोयल (दांतरदा वालों) ने पूरी जीवंतता के साथ निभाया था। दुर्योग की बात यह रही कि हज़ारों दिलों पर राज करने वाले श्री त्रिपाठी और श्री मंगल युवावस्था में हो प्रयाण कर सबको स्तब्ध कर गए। अरसा पूर्व दिवंगत श्री गोयल के बाद श्री गुप्ता के प्रयाण ने रामलीला समारोह की उस समर्थ श्रृंखला के अंतिम समर्थ कलाकार को भी हम सबसे छीन लिया। जिनसे जुड़ी तमाम यादें अब ज्वार बन कर उमड़ रही हैं।
मिडिल में पीसी सर मेरे विज्ञान शिक्षक रहे। रामलीला के विशेष समर्थक व प्रशंसक के तौर पर उनका सान्निध्य गर्व की अनुभूति कराता था। संयोगवश श्री त्रिपाठी व श्री मंगल भी महाविद्यालय स्तर पर मेरे सीनियर होने के बावजूद मेरे अग्रजवत मित्र रहे। कुछ ऐसा ही सुयोग 1990 के दशक में बना। मैं पत्रकारिता व सृजन के क्षेत्र में स्थापित हो गया और पीसी सर क साथ मेरे सम्बन्ध मित्रवत हो गए। शिक्षक संगठन के साथ सामाजिक संगठन की राजनीति में सर की गहन रुचि व भूमिका थी। इस नाते हमारे बीच संपर्क संवाद सतत बना रहता था।
गुरु-शिष्य परम्परा वाले भाव सदैव रहे किंतु सर ने अपनी ज़िंदादिली, उदारता और सरलता के साथ उसे काफी हद तक दोस्ताना बना दिया। सन 2000 के दशक में खण्ड शिक्षाधिकारी के तौर पर वे श्रीमती जी के अधिकारी व मार्गदर्शक भी रहे। इस कार्यकाल के दौरान उनका विशेष स्नेह व सहयोग हमें मिला। क्षेत्र में अग्रणी अग्रवाल समाज के अध्यक्ष के तौर पर समाज हित में उनकी सेवाएं उल्लेखनीय रहीं। जिनका मूल्यांकन उनकी विदाई से आहत समाज ही कर सकता है।
शासकीय सेवा से मुक्ति के बाद पीसी सर ने क्षेत्रीय राजनीति में प्रभावी भूमिका का निर्वाह किया। इस दौरान राजनैतिक परिदृश्यों व सम्भाववनाओं को लेकर उनकी जिज्ञासा व जानकारी लगातार बढ़ती रही। बोहरा बाज़ार स्थित अपने पुत्रों के इलेक्ट्रॉनिक स्टोर उनकी बैठक बन गए थे। जहां से होने वाली रहगुज़र मुझे उनकी निगाह में तत्काल ला देती थी। आवाज़ देकर बुलाना और सियासी मुद्दों पर चर्चा छेड़ना उनकी अभिरुचि में शामिल था। व्यस्तता के कारण मैं अक़्सर दबे पांव गुज़रने का प्रयास करता था। जो बहुधा नाकाम होता था। अधिकारपूर्वक प्यार भरे लहजे में लताड़ लगाने के साथ ही सर कुछ देर बैठने का आदेश दे डालते थे। जिसे पूरा करना मेरे लिए अहम होता था।
यह वो दौर था जब वे बिना किसी तरह की औपचारिकता के पान मसाला या तम्बाकू खिलाने का आदेश देने लगे थे और मैं संकोच के साथ उनकी आज्ञा का पालन कर देता था। शब्द हर बार चिर-परिचित अंदाज़ में होते थे- “लाओ, दो-चार दाने खिलाओ।” जो आज भी कानों से मानस तक में गूंज रहे हैं। मेरी पीसी सर से आखिरी मुलाक़ात वर्ष 2019 की दीवाली के आसपास हुई थी। तब मैं ग्वालियर में प्रवासरत था और महापर्व मनाने श्योपुर आया हुआ था। अस्वस्थता के दौर से गुज़र कर भी सक्रिय पीसी सर से अगली भेंट महामारी के दौर ने नहीं होने दी।
काश, एक बार उनके स्नेहपूर्ण सान्निध्य व दर्शन का लाभ मुझे मिल पाता। काश कि मैं एक बार फिर पारिवारिक व आत्मीय परिवेश में उन्हें भोज के लिए आमंत्रित कर पाता। श्रीमती जी के हाथ की दाल- बाटी के वे बड़े प्रशंसक थे और अक्सर उस एकमात्र दावत का ज़िक्र करते थे जो हमने आग्रहपूर्वक उन्हें दी थी। तीन साल पहले आज ही के दिन हम सभी को स्तब्ध कर हमारे पीसी सर अनंत की यात्रा के लिए निकल गए। हम उनके प्रति तृतीय स्मृति दिवस पर भावपूरित श्रद्धासुमन अर्पित कर सकते हैं, इस संस्मरण के रूप में। संवेदनाओं की अभिव्यक्ति से अधिक शायद कुछ कर भी नहीं सकते हम। परमसत्ता उनकी महान आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थायी रूप से विराजित रखे, यह हमारी आत्मीय प्रार्थना तब भी थी, अब भी है। विनम्र प्रणाम।।
●संपादक/न्यूज़&व्यूज़●
श्योपुर (मध्यप्रदेश)
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