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13 Feb 2023 · 10 min read

😊 आत्मकथा / 55वी सालगिरह पर

😊 #आज_जानिए_आप_मुझे….
■ मैं ”सिरचन” सा “हामिद” मुझ में…!!
★ अपना दर्पण : अपना ही बिम्ब
★ आज जीवन के 55 साल पूर्ण
【प्रणय प्रभात】
आज मैं अपने बचपन की उंगली थामे पचपन साल का हो गया हूँ। लिहाजा आज किसी और की नहीं, अपनी बात करना चाहता हूँ। उम्मीद है आज आप को अपने बारे में बहुत कुछ बता पाऊंगा। इस पावन धरा-धाम पर मेरा आगमन आज 13 फरवरी को ही हुआ था। ननिहाल जयपुर के जनाना अस्पताल के रास्ते। पिता जी का उत्तरप्रदेश के फ़िरोज़ाबाद से पैतृक रिश्ता रहा कभी। अब प्रयोगवाद के जनक और अज्ञेय कृत तार-सप्तक के अग्रणी कवि गजानन माधव “मुक्तिबोध” की जन्म-स्थली श्योपुर (मध्यप्रदेश) का मूल निवासी हूँ। जो शौर्य भूमि के रूप में मान्य चम्बल संभाग का एक सरहदी ज़िला है। तीन ओर राजस्थान के तीन जिलों (कोटा, बारां, सवाई माधोपुर) की सीमाओं से सटा हुआ। मृत्युलोक में पदार्पण की दास्तान को अपने जीवन के 55 साल पूरे होने के अवसर पर आज आत्मकथा (ऑटोबायोग्राफी) के तौर पर आपके समक्ष रख रहा हूं। कुछ इस तरह कि याद रहे आपको।
दूसरे भारत-पाक युद्ध के 3 साल बाद और तीसरे भारत-पाक युद्ध से 3 साल पहले हुई थी मेरी पैदाइश। वो भी कथित “प्रणय दिवस” (वेलेंटाइन डे) से एक दिन पूर्व ब्रह्म-मुहूर्त के उपरांत सूर्योदय वेला में। दर्शन-शास्त्री मामा ने इसी हिसाब से नामकरण कर दिया “प्रभात।” बौद्धिक संपदा और क़लम के धनी कायस्थ कुल में जन्म हुआ तो लेखनी की साधना करनी ही थी। कुछ प्रभाव वंशानुगत भी था। ग्वालियर रियासत में मुलाज़िम रहे पितामह व पिता दोनों उर्दू के अच्छे जानकार रहे। माताजी हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर व शिक्षण में उपाधि सहित प्रयागराज विश्वविद्यालय से साहित्य-रत्न भी।
साहित्य परम्परा विरासत में मिली। साढ़े तीन दशक से अधिक की शब्द-साधना आज भी चल रही है। वो भी “वंदे भारत एक्सप्रेस” की गति से।
जहां तक शिक्षा-दीक्षा का सवाल है, नींव का निर्माण आदर्श शिक्षकों के मार्गदर्शन में हुआ। दुर्भाग्यवश रुचि-विरुद्ध थोपे गए वाणिज्य के विद्यार्थी के रूप में जैसे-तैसे उपाधि प्राप्त की। कालांतर में हिंदी साहित्य की उपाधि प्रथम श्रेणी से अर्जित कर चैन आया। इससे पहले पत्रकारिता और जनसंचार का भी छात्र रहा। अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र, अपराध शास्त्र सहित पत्र-पत्रिकाओं, धर्म-ग्रंथो व उपन्यासों में गहन रुचि रही। अन्वेषण और विश्लेषण का शौक़ किशोरावस्था से रहा।जिसने आज प्रौढ़ावस्था तक भी साथ नहीं छोड़ा है।
07 फरवरी 1991 को दाम्पत्य जीवन में पदार्पण हुआ। यह ईश्वरीय कृपा रही कि जिस दिन बेटा बन कर धरती पर आया, उसी दिन पहली बार पिता बना। सन 1993 में 13 फरवरी को ही बिटिया “निरुपम” के रूप में मनचाहा उपहार मिला। वो भी 25वीं सालगिरह के दिन। चार साल बाद बेटे “प्रख्यात” का जन्म हुआ। जो डिप्लोमा इंजीनियर होने के बाद संगीत में स्नातकोत्तर उपाधि के लिए अध्ययनरत है। एक गीतकार, संगीतकार व एंकर के रूप में पहचान बनाने की दिशा में अग्रसर। बहुआयामी प्रतिभा की धनी बिटिया शिक्षण क्षेत्र को समर्पित है। हिंदी-अंग्रेज़ी पर समान अधिकार के साथ लेखन, फैशन डिजाइनिंग में भी निपुण। श्रीमती जी समाजशास्त्र व हिंदी सहित शिक्षा प्रशिक्षण में उपाधि प्राप्त एक लोकप्रिय व आदर्श शिक्षिका। जिनकी पहचान उनकी अपनी योग्यता व कर्तव्य-निष्ठा की देन है।
यायावर के तौर पर रेल यात्रा और छायांकन मेरी खास अभिरुचि का हिस्सा रहा है। तस्वीरों और यात्राओं पर लिखना भी। मंच संचालन सहित हिंदी, उर्दू के मंचों पर काव्यपाठ करता रहा हूँ। किसी मठाधीश का गुर्गा या गिरोह का सदस्य बन पाता तो पांचों उंगलियां घी में होतीं। हो सकता था कि सिर भी कढाई में होता। चापलूसी का हुनर नहीं था तो बिना शह के मात होती ही रहनी थी। हुई भी नीचे वालों की कृपा से। मंचन, पठन-पाठन व यात्राओं के शौक़ की पूर्ति के लिए शिक्षक के तौर पर दो दशक बिगाड़े। औरों के गमले सींचने में ऐसा उलझा कि अपना बिरवा सुखा बैठा। लोगों ने “घड़ी डिटर्जेंट” की तरह इस्तेमाल तो किया मगर मतलब पूरा होने के बाद विश्वास करना भूल गए। बाद में “संचार कौशल” का प्रशिक्षक भी रहा और प्रेरक वक्ता भी। विविध विषयों पर दो हज़ार से अधिक छोटे-बड़े आयोजनों में मुख्य वक्ता व अतिथि रूप में सहभागिता भी रही। चार साल पहले तक, जब वाणी साथ थी।
वास्तविक जीवन मे वो ही हूँ जो हूँ। वैसा ही हूँ जैसा दिखता हूँ। जो महसूस करता हूँ वही लिख डालता हूँ। अपने अंदाज़ में, बिना किसी लाग-लपेट के। यूं तो एक आशावादी, सकारात्मक व संवेदनशील सृजनधर्मी ही हूँ, मगर मुझ में छिपा एक स्वाभाविक व्यंग्यकार और जन्मजात विद्रोही अक़्सर मुखरित हो उठता है। कभी विद्रोह और क्षोभ की चिंगारी भी जागती है। जिसे शांत करने का काम लेखनी से कर लेता हूँ। तनाव प्रबंधन व समय प्रबंधन से अवगत होने के कारण। सतत सृजन का उद्देश्य अपने सामयिक व तात्कालिक उद्वेग से पार पाना भर है। किसी व्यक्ति, संस्था या समुदाय की भावनाओं को आहत करना कतई पसंद नहीं। दोस्तों का दोस्त रहा हूँ। अब ज़रूर बोझिल सम्बंधों से ऊबने लगा हूँ। जिसकी बड़ी वजह दृष्टि-बाधा के समानांतर “कर्क” (कैंसर) जैसी गंभीर व्याधि रही। जिसने तीन साल में दुनिया और रिश्तों का सच दिखाया। बहुत कुछ सिखाया भी, जो किसी कॉलेज में सीख पाना संभव नहीं था। वैयक्तिक रूप से इस आपदाकाल को ईश्वरीय वरदान मानता हूँ। जिसने निरर्थक कार्यों व झूठे संबंधों से दूर कर सृजन व श्रवण साधना की ओर उन्मुख किया। सक्रिय पत्रकारिता में संलग्न रहते इतना चिंतन, मनन व लेखन कदापि संभव नहीं होता।
पारिवारिक की तरह सामाजिक व सार्वजनिक व्यवहार दिमाग़ के बजाय दिल से निभाने में अव्वल रहा। लिहाजा हर क़दम पर ठगा भी ख़ूब गया। खून के रिश्तों पर नहीं दिल के नातों पर भरोसा रहा बस। अब वो भी मृतप्राय सा है। इसके लिए मैं नहीं ख़ुद रिश्ते ही ज़िम्मेदार हैं। पार्ट टाइम रिश्ते या सम्बन्ध कोई महत्व नहीं रखते मेरे लिए। मैं पूर्णकालिक सम्बन्धों का पक्षधर था और अब भी हूँ।
सुप्त ज्वालामुखी मानते हैं क़रीब से जानने वाले कुछ क़रीबी। मेरा मानना है कि थोड़ा गुस्सा ज़रूरी भी है ताकि औक़ात राख जैसी न हो। गुस्सा भी कुछ पल का, जो शीघ्र निकल जाए और दिमाग़ मे घर न करे। खिलवाड़ करता नहीं, सहता भी नहीं। अपेक्षा करता नहीं और उपेक्षा भाती नहीं। सिर पर बिठाता हूँ पूरी नम्रता के साथ। धृष्टक पर धराशायी करना भी जानता हूँ। जो नज़र से गिर गया वो इस जन्म में तो स्वीकार नहीं। अगले जन्म का मुझे खुद नहीं पता। ग़लत को ग़लत कहने से ख़ुद को रोक नहीं पाता। तमाम बार खामियाज़ा भुगतने के बाद भी। थोड़ी बहुत हाज़िर-जवाबी सतत अभ्यास की वजह से है। कुछ अनुभव होना चाहिए बस, व्यक्त करने में देर नहीं लगती। यह माँ वाणी की अनंत कृपा है।
सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर सामाजिक सरोकारों के प्रति सजग व सक्रिय अब भी हूँ। लगातार हाशिए पर धकेले जाने के बाद भी। चला कर ठंसने और धंसने की आदत नहीं। अपमान और अवमानना से डरता रहा हूँ। लिहाजा बेहद संकोची रहा। एक दौर तक बैक-बेंचर भी। इस्तेमाल होता रहा पर करना कभी सीख नहीं पाया। अब उम्मीद भी नहीं कुछ सीख पाने की। किसी को गिरा कर आगे निकलना न आया, न भाया। बावजूद इसके गर्व है अपने पिछड़े रहने पर। शिक्षा स्कूल, कॉलेज से ज़्यादा दुनिया से पाई। स्वाधीनता पसंद रहा, इसलिए सरकारी सेवा में कभी नहीं रही मेरी रुचि। जीवन बेहद साधारण पर गौरव से परिपूर्ण रहा।
यह मेरे आराध्य प्रभु श्री राम जी की असीम अनुकम्पा है। परम् सद्गुरुदेव श्री हनुमान जी महाराज की प्रेरणा भी। आध्यात्मिक गुरुदेव परम् पूज्य स्वामी श्री राजेश्वरानंद जी व अकादमिक गुरु ख्यातनाम कवि डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन जी के प्रति चिर-कृतज्ञ हूँ। जिनसे जीवन को सही समय पर सही दिशा ही नहीं ऊर्जा भी मिली।
कभी कोई गॉड-फादर नहीं बनाया। मेरे फादर खुद गॉड थे मेरे लिए। उन्ही के आदर्श रहे कि ख़ुद का निर्माण ख़ुद कर सका। सामाजिक, पारिवारिक और सार्वजनिक दायित्व निभा पाया अब तक। इसका समूचा श्रेय जीवन-संगिनी “प्रीति” को, जिसने मुझे राष्ट्रीय और सार्वजनिक संपदा स्वीकार कर सारा भार सहर्ष अपने कंधों पर ले लिया। बिना किसी शिकवा-शिकायत के। वर्ष 2020 के बाद पैरोल पर मिली सांसें भी सहधर्मिणी की देन है। कहने में मुझे कोई गुरेज़ या परहेज़ नहीं। गर्व है अपने भारतीय व सनातनी होने पर। गर्वित हूँ अपनी धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विरासतों पर। संतोषी हूँ और संचय से दूर भी। कर्म और भाग्य पर साझा भरोसा है। आशावादी और आस्थावादी हूँ। लिहाजा ऊपर वाले की रज़ा का मज़ा लेता आया हूँ। अब कुछ ज़्यादा ले रहा हूँ। तभी दर्द दवा बन कर साथ दे रहे हैं। हर हाल में खुश होकर जीने में विश्वास है। ज़िंदा-दिली ग़म में भी ठहाका लगाने का साहस देती आई है। इसी जिजीविषा के बूते आज इतना कुछ लिख पाने में सफल हो पा रहा हूँ। वरना लेखनी तीन साल पहले थम चुकी होती।
औरों की पीड़ा, बेबसी द्रवित करती है। ख़ास कर जीव-जंतुओं की। जिनके प्रति बहुत कुछ न कर पाने का दुःख सालता है। फिर भी धर्मप्राण धर्मपत्नी के सहयोग से छोटी-मोटी कोशिशें इस अपराधबोध को कुछ कम करती रहती हैं। दुनिया का कोई भय नहीं क्योंकि श्री रामचरित मानस से पूरी तरह प्रेरित हूँ। “हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ” जैसी एक अर्द्धाली ने यह साहस दिया है। जीवन मे गोस्वामी तुलसीदास जी की भूमिका सूक्ष्म संरक्षक व पथदर्शी की रही है।
जो करेगा, जब करेगा, जैसा करेगा, बस ईश्वर करेगा। इस अवधारणा पर अटल विश्वास है।
ईश्वर बुरा कभी करता नहीं। इतना सा पता है बस। जो आज मान्यता बन गया है मेरे लिए। लल्लो-चप्पो यानि ठकुर-सुहाती नहीं कर पाता। जो आज के युग मे अपने पिछड़ेपन की मूल वजह मान सकता हूँ। जीवन खुली किताब की तरह रखा है। जो पल भोगे, जिए सब उकेर दिए काग़ज़ पर। गुणो का पता नहीं पर अवगुण सारे जानता हूँ अपने। जिन्हें मानने और स्वीकारने में भी कोई हिचक नहीं। कमज़ोरियाँ कभी नहीं छुपाईं। लिहाजा शुभचिंतकों को आसानी से पता चलता रहा कि दुखती रग कौन सी है और चोट कहाँ करना है। किसी की निजी जिंदगी में हस्तक्षेप पसंद नहीं रहा। अपनी ज़िंदगी मे कथित अपनों के बरसों-बरस हस्तक्षेपों की कोई कमी नहीं। ईश्वर फ़टे में टांग देने वालों को सद्बुद्धि देगा, कभी न कभी। यहीं सोचा हमेशा। शायद तभी मेरा चौथापन सुधर रहा है। बुरे वक़्त ने तमाम कंटक दूर जो कर दिए राह के।
तीन दशक के पत्रकारिता काल में दो दर्ज़न से ज़्यादा ठिकाने बदले, पर काम के प्रति लगन व श्रम के भाव कभी नहीं बदले। हर दायित्व के प्रति गंभीर व ईमानदार रहा। जिसका प्रतिफल प्रतिष्ठा व पहचान के रूप में मिला। कालजयी कथाकार फणीश्वर नाथ “रेणु” जी के अमर पात्र “सिरचन” का प्रतिरूप जो हूँ।
किशोरावस्था से युवावस्था तक आधा लाख से अधिक विविध उपन्यास पढ़ने और कथा प्रवचन सुनने का जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ा, जो आज तक बरकरार है। इसी स्वाध्याय ने सृजन की पगडंडी पर लाने और बढाने का काम किया। वर्ष 1984 से हिंदी और 1987 से उर्दू में छूट-पुट लेखन की शुरुआत कर आज इस मुक़ाम पर हूँ। दोनों भाषाओं की लगभग सभी प्रचलित विधाओं में कितना लिखा है, इसकी गिनती में आज ख़ुद असमर्थ हूँ। आलमी स्तर के शायरों व कवियों के साथ एक सौकडा से अधिक संकलनों व स्मारिकाओं में छपा हूँ। अर्थाभाव ने निजी संग्रह के प्रकाशन की राह में रोड़े अटका रखे हैं। संस्थागत सम्मान व पुरुस्कार तमाम मिले। सरकारी न मिला, न मिलेगा। उसके लिए आवेदन करना होता है, जो आदतन मेरे बूते का नहीं। सम्मान व पुरुस्कार का फ़र्क़ पता है मुझे। न मांग कर लेना चाहता हूँ, न खरीद कर दीवार पर सजाना।
बहरहाल, आपकी तमाम इनायतों और नवाज़िशों को सलाम। अपने मिज़ाज की नुमाइंदगी करती इस छोटी व आधी-अधूरी कविता के साथ :–
“न्याय भावना अलगू वाली
दृढ़ता मानो पत्थर सी।
दया काबुली वाले जैसी मासूमो में जान बसी।।
धनिया वाले होरी सा अंतर्मन सच्चा रखता हूँ।
ईदगाह वाले हामिद सा दिल मे बच्चा रखता हूँ।
वंशीधर हूँ मुझे अलोपीदीन सुहाएंगे कैसे?
मैं ‘सिरचन” सा बतला मुझको ताने भाएँगे कैसे?”
कथा-साहित्य के ये पात्र मुझे ख़ुद में छिपे महसूस होते आए है हमेशा से।
“संजीदा किस्म की मसखरी” कर लेता हूँ अक़्सर। सिर्फ़ उससे, जिससे खुल जाऊं थोड़ा सा। सामान्यतः अदब को रिश्तों की नींव मानता हूँ। जिनसे विशेष लगाव होता है, उनसे साधिकार झगड़ लेता हूँ। अधिकार के साथ कोई दे तो गाली खाने से भी कोई परहेज़ नहीं। आडम्बर व पाखण्ड से मुक्त आस्तिक हूँ और ऊपर वाले को धोखा देने की कोई मंशा नहीं रखता। भक्ति और अंधभक्ति के बड़े अंतर की थोड़ी-बहुत समझ है मुझे। पता है कि उसे बाहर क्या तलाशना जो अंदर ही घुसा बैठा है। भीड़ में धक्के खाने का कोई शौक़ नहीं। थोथा प्रदर्शन और दिखावे का अनुकरण आता तो राजनीति में होता। रफ़ू करने की कला आती है। बखिया उधेड़ने में पीएचडी मान सकते हैं आप। मानना चाहें तो। डीलिट भी हो सकता हूँ कभी न कभी। किसी की सहमति-असहमति पर कोई ज़ोर-ज़बर्दस्ती नहीं है। भाषण वाले नहीं कर्म वाले राष्ट्रवाद से प्रेरित हूँ, हमेशा रहूंगा। राजनीति के अखाड़े में लंगोट फहराते किसी भी छोटे-बड़े राजनेता या उसके दल के साथ कोई जायज़-नाजायज़ रिश्ता नहीं मेरा। किसी भी विचारधारा से कोई वैमनस्य भी नहीं। सहमति या असहमति का सम्बंध विषय से होता है। जिसमे देश-काल और वातावरण की अहम भूमिका होती है। बहरहाल, अपना काम कर रहा हूँ। दृष्टि-बाधा की स्थिति में भी शब्दबाण चलाने का काम मिला हुआ है। आप चंद वरदाई जैसे मित्र बनकर लक्ष्य सुझाएंगे तो शर-संधान और लक्ष्य-बेधन सहज होगा मेरे लिए।
चलते-चलते हृदय से धन्यवाद उन परछाइयों को भी, जो उजाले में साथ रहीं और साँझ ढलते देख विलीन हो गईं। धन्यवाद उन्हें भी जिन्होंने तीन वर्ष पूर्व ही मुझे दिवंगतों में शुमार कर बेशुमार प्यार और कृतज्ञता का इज़हार किया। ऐसा न होता तो न मौत के आगे अड़ने का जज़्बा जागता न ज़िंदगी के लिए लड़ने का। कुछ गिने-चुने आत्मीयजन जो संघर्ष में साथ रहे, उनके प्रति हार्दिक कृतज्ञता। जय हिंद, वन्दे मातरम। जय राम जी की।।
■ प्रणय प्रभात ■
डेरा तम्बू @ श्योपुर (म.प्र.)

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