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–कैसे दूँ इल्ज़ाम भला–

मुझे लिखने का शौक नहीं,लिखता हूँ वक़्त बिताने को।
कवि कहने का बहाना हुआ,सुनिए मीत इस ज़माने को।।

आशिक करते हैं शायरी,कहते हैं ये दुनिया वाले।
कौन समझाए इनको रे,जो हैं तोहमत लगाने को।।

पत्थर रख दिल पर सहूँ सब,ज़ुल्मों-सितम हया रे यारा।
शीशा-ए-दिल तो टूटते,यहाँ केवल शोर मचाने को।।

दिल की बात कहना तो यहाँ,ख़तरे से खाली नहीं हाय!
जोख़िम उठाता हूँ पलपल,मन अपना यार रिझाने को।।

हर बात अच्छी लगे मेरी,ये ज़रूरी तो नहीं है रे!
फिर भी लिखता हूँ ज़िद्द में,रूठा हुआ दिल मनाने को।।

सुबह-शाम रंगीन हो तो,मज़ा ज़िंदगी का आ जाए।
ढूँढता हूँ गीतों में मैं,प्यार के नेक अफ़सानों को।।

“प्रीतम” ज़िन्दगी की हर शै,तुझमें ही जाकर मिलती है।
पाता सूरत तुम्हारी ही,देखकर दिल के ठिकानों को।।

*********राधेयश्याम बंगालिया
प्रीतम कृत***************
मापनी…15-16-15-16

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