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💐💐प्रेम की राह पर-11💐💐

35-परिस्थिति जन्य दोष तो सभी में अंकुरित होते हैं।फिर मैं और तुम किसी भी दोष से मुक्त न हो सकेंगे।दोषारोपण भी सामान्य कृत्य नहीं हैं।कहीं न कहीं आप निश्चित ही प्रभावित हैं उन सभी स्वमूल्यांकन की विधि से जो एकपक्षीय है तो दोषों का उद्भव तो निश्चित अवश्य ही होगा।तो फिर आप उनका किस प्रज्ञा से बौद्धिक कर रहे हैं।यह आप पर ही निर्भर करता है। निरन्तर किसी के व्यक्तित्व में दोषों का दर्शन करना यह आप स्पष्ट मान लीजिए कि आप भी उन दोषों में भागीदार बनते जा रहे हैं।यह कोई कौशल नही हैं कि स्वयं को सर्वदा सर्वश्रेष्ट की पंक्ति में स्थापित करने में लगे रहो।आप लगातार हीनभावना से ग्रसित होंगे असफल होने पर यदि उचित योजना का कार्यान्वयन न हुआ तो।फिर अफ़सोस के अतिरिक्त कोई विकल्प न बचेगा। हे हमनफ़स!तुमने मेरे उन सन्देशों में इतने दोषों का दर्शन एक बार में ही कर लिया था कि अपने को क्या अधिक बुद्धिजीवी समझ बैठे।तुम्हारा समझना जाने किस स्तर का है।जो एक सहृदय भोलेभाले मनुष्य को समझ ही नहीं सका।ख़ैर तुम्हारे कलुषित वचनों से में तुम्हारी अवनति के विषय में नहीं सोचूँगा।इस विषय में तुम दृढ़ रह सकते हो।मैं तो किसी पुस्तक के आख़िरी पृष्ठ पर अंकित सहयोगी पुस्तकों जैसा हूँ।शायद मुझे पढ़कर तुम्हें संसारी विश्वासघात परीक्षण की विधि ज्ञात हो गई हो।तो मैं तो अविश्वासी नहीं हूँ।और न ही विश्वासघाती हूँ।और वैसे भी तुमने थूककर और जूता मारकर अपनी परीक्षण विधि का शाश्वत प्रयोग कर लिया।जिसने दी तुम्हें महाशान्ति वह भी मुझे अशान्त कर के।छीन ली तुमने मेरी शान्ति इस सुलझे हुए प्रेमसंजाल को छिन्न-भिन्न करके और न किया कभी उसे दोबारा बनाने का संकल्प।तो तुम ठहरे ज़्यादा पढ़े लिखे।मैं तो गँवार था।एक दम निठल्ला लोफ़र।तुम्हारा थूकना और जूता मार देना एक सभ्य और पढ़ी लिखी स्त्री के लिए ज़्यादा सहूलियत भरा और आसान है और यदि एक पुरुष बेग़ैरत नहीं हैं तो वह इसे अपनी सीरत में याद रखता है।यह मुझ जैसे मानुष के लिए घटित होने वाली प्रथम घटना होगी।वह निर्दोष कर भी क्या सकता है।वह आख़िर में समझ लेता है कि विशुद्ध प्रेम का मिलना भी एक सुख का परिणाम है।यदि यह नहीं मिला तो कर्म की प्रेरणा फलित नहीं हो रही है।अवसाद से ग्रसित होना कि तुम्हारा न मिलना,तुम्हारे प्रति समर्पित किये प्रेम की प्रतिध्वनि को ही पुनः पुनः वर्द्धित करता है।इसमें कोई सदोषता नहीं है।यह शुद्ध भाव हैं जो किसी के कहने पर नहीं उठते हैं।यह तो उठते हैं कभी कभी बहुत ज़ोर से।जिनका मूल्य तुम्हारे जैसा निष्ठुर कदापि न समझ सके।मैं तो एक भँवरे की तरह तुम पुष्प पर प्रेमरसपान करने के लिए आगे बढ़ा परन्तु तुमने मुरझाकर मेरे उत्साह को ही नष्ट कर दिया।अब किस पुष्प पर विश्वास करूँ।सब अपने रंग में रंगे हुए हैं।पर तुम कुछ ज़्यादा रँगीन थे।पर एक पल में मेरे लिए तुम्हारा फीका हो जाना कितना कष्टदायक रहेगा मेरे लिये।इस विषय में भी मैं स्वयं को अब अधूरा न कहूँगा।यह अग्नि ही है जो मुझे मन्द मन्द संत्रास दे रही है।व्याकुल अभी भी हूँ कि तुम कोई निशानी दे सको।तो भेज दो अपनी किताब और जो इच्छा हो सो।किसी से बिना पूछे।किसी से कोई कानाफूसी नहीं होगी।मेरा स्वभाव एकदम बिरला व्हाइट पुट्टी जैसा श्वेतवर्णीय है।इसे अंकित करना कि मानवीय प्रेम में असभ्यता कई न्यूनताओं को जन्म देती है।जिसमें जन सामान्य का हम जैसे लोगों से विश्वास का लुप्त हो जाना शिखर पर है।कोई भी,कैसा भी दुर्भावना से किसी भी गलत सामग्री का प्रेषण नहीं किया जाएगा मेरे द्वारा।हाँ, डिजिटली अवपीड़ित कर सकता हूँ।जिसमें तुम भी दक्ष हो और बार-बार करती हो।हे पतंगी!यह स्मरण करने योग्य है।तुम अपनी मूर्खता की गंगा में डुबकी लगाते रहो,लगाते रहो।

©अभिषेक: पाराशर:

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