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16 Sep 2022 · 4 min read

💐💐प्रेम की राह पर-64💐💐

वे सभी श्रेणियाँ दिवस में भी स्याह प्रतीत होंगी।जिन्हें तुम अपने ख्यालों में पुनः पुनः अपना मानवीय रूपक देना चाहते हो।तुम ऐसे टूट जाओगे जैसे कीड़े लगा हुआ फल टूट जाता है।अन्तर्द्वन्द्व न समाप्त होगा तुम्हारा।वह भँवर निश्चित ही तुम्हें अपने आगोश में ले लेगा जहाँ तुम स्वयं को सबसे सुरक्षित महसूस करते हो।तुम्हारा महसूस होना तुम्हें न महसूस होगा।किसी कर्मफल और इससे योग में रहने वाले अन्य उद्देश्य शर्वरी की भाँति उजियारा तो करेंगे परन्तु तुम उस अग्रिम आने वाले दुरूह तिमिर से वाकिफ़ रहकर भी उससे कभी विजित न होगे।आन्तरिक प्रेरणा उस किसी भी साहस का उद्भव न करेगी जिसे तुम उसे अपने शब्दों में कहना उचित समझते हो।वे सभी धर्म जिन्हें तुम अपनी विदग्धता से परिचय को प्राप्त हो।वे कभी तुम्हें शान्ति की मणिमाला को स्मितहास से भेंट न करेंगे।तुम उल्लू की तरह गर्दन अन्दर बाहर करना वह भी स्वयं को छलने के लिए।कोई भी प्रेम तुम्हें सौन्दर्य के आघात से प्रसन्नता न देगा।निरन्तर एकाकी अनुभव ही करोगे।अपने गुण सभी अवगुण ही नज़र आयेंगे।भाव की गंगा, विचारों की यमुना और बुद्धिरूपी सरस्वती का संगम तुम कभी भी अन्वेषित न कर सकोगे।यदि होगा भी तो वह समझ से परेय।उस माया का भंजन तुम कभी भी न कर सकोगे जिसे तुमने संसारी खेल समझ लिया है।हाँ ईश्वरीय नहीं संसारी माया।एक क्षण भर के लिए अपने को तठस्थ होकर देखो।तुम सांसारिक कलाओं में कितने पारंगत हो।उनसे निर्वहन की विधा में तुम कितने दीक्षित हो।पीड़ा तो एक चींटी को जितनी होती है उस पीड़ा का अनुभव एक मनुष्य को भी उतना ही होता है।परन्तु मानव उस पीड़ा के गुलाल को कई चतुर लोगों में लगाकर स्वयं को अवमुक्त कर लेता है और बाँध लेता है प्रसन्नता की पोटली।क्या उससे उस मानव को कैसी भी स्निग्धता का आभास हुआ?जिससे उसे पीड़ा का बोझ कम प्रतीत हो।नहीं?परन्तु वह मानव उसे मानकर हल्का हो जाता है।यदि उस पीड़ा का कोई हिस्सा यदि बचता तो उसका अनुभव और उस पीड़ा के पीछे के कारणजन्य दोष।तुम किसी परिस्थिति विशेष के सरोकार में न रहना।सभी परिस्थितियाँ तुम्हारे सम्मुख प्रकट हो कभी न पूछेंगी कि तुम्हारा कोई सहयोग करें।उन्हें तुम्हें अपनाना होगा। फिर शरद की पूर्णिमा के इन्दु जैसा तुम्हारा चेहरा कभी चमकार न देगा और किसी भी चमत्कार की सृष्टि के आलिंगन में स्वयं को सम्मिलित न करना।मनुष्य की यदि कामना पूरी न हो तो वह ईश्वर को भी पूरी ताकत से झिड़क देता है।भले ही कर कुछ न पाए।तो तुम भी झिड़क देना।उस सर्वशक्तिमान को।तो क्या तुम आनन्द को प्राप्त कर लोगे?नहीं।इस धरा पर मनुष्य के रूप में घूमता ईश्वर तुमसे आनन्द लेगा और उसे तुम में ही खोजेगा।तुम समझते हुए भी कुछ न कर सकोगे।तुम्हारे द्वारा दिये गए प्रतिघात उस मर्म को कभी न समझ सके जो प्रथम प्रेम की शुरूआती अग्नि के मध्य में भी दो आत्माओं के बीच में निर्दोष होता है।क्यों कि वे प्रतिघात भी निष्ठुरता के परिचायक थे।क्या इनसे कोई आलोक होगा?न न।तुम अंधकार में जी रहे हो।किताबों का भी अन्धकार है,जब उन्हें सच्चा मित्र न माना जाए।क़ुतुबफरोस क्यों न खोज लेता अपने हिस्से के प्रकाश को और हो जाता सूरज।नहीं न।अपने मन को उद्विग्न करते रहो।खोजो रक्त सम्बन्धों में प्रेम की बयार।सब जी रहे हैं अपने स्वार्थ की सिद्धि में।समय-समय पर लोगों की इज्ज़त जाती रहेगी।धूर्तों की धूर्तता कुछ इस तरह मुँह चिढाएगी और बना ले अपनी योजना।कोई देव न प्रकट होंगे उनके जीवन में।कोई न आदर परोसेगा।आयु के अन्तराल मंद मंद चाल से चलकर लुप्त हो जायेंगे।बचेगा क्या?ठेंगा।विद्युतवाहक बल वाला।तुम अपनी गलतियों का सृजन सामूहिक रूप से स्वयं करोगे।उन सभी उदासियों के साथ कि सुख की कोई दासी ही हल्की सी थपथपी दे दे और चूर चूर कर दे गलतियों से भरे दुःख के साम्राज्य को और छू करदे इस हृदय की पीड़ा को।अपने सौंदर्य,हाँ घटिया सौंदर्य, का समूह गान बन्द कर दो।कूँद जाओ किसी किले की गहरी घाटी में।वहाँ खोजना उस मृत्यु के लक्षण जो ग्लानि से भरपूर होंगे।हाँ, हाँ चिन्ता न करना वहाँ मैं उपस्थित होकर तुम्हें रेशम की रस्सी से निकाल लूँगा।यह देखकर की कहीं तुम्हारे कोमल हाथों पर रस्सी के निशान न बन जाएं।खींच लूँगा तुम्हें प्रेमरूपी रस्सी से उस जीवनरूपी किले की दम्भरूपी खाई से।तुम उत्सुक न बनना।मृत्यु के प्रति।तुम्हें जीवन दूँगा।जीने के लिए।उस क्षण को भी जीने के लिए कि कोई मुझ पर आरोप न लगाये कि रेशम की रस्सी का प्रयोग क्यों,नायलॉन का प्रयोग क्यों नहीं?तो दे दूँगा उन ईर्ष्यालु जनों को गुलाबजल और कहूँगा और कहूँगा लो सूँघो इस तत्व को जो उसके हाथों से निकला द्रव है।उसके हाथों से यह निकलता है रक्त नहीं।अपने जीवन में संघर्ष के कितने मौक्तिक सुरक्षित रखे हैं।कितने।हाँ हाँ कितने।फिर जीवनभंगिमा की प्राणमयी माला क्यों नहीं पिरोयी?क्यों कि बिता दिए जीवन के बसन्त उन मोतियों का संग्रह किये बिना जो इस अन्धे संसार में लोग अपने प्रक्षिप्त शुद्ध ठगे चारित्रिक गुणों के संवाद से नियोजित कर शानदार निर्वचन का रसास्वादन कराते हैं।फिर क्या संग्रह किया तुमने अपने सोलह सौ ग्राम के दिमाग में?सहस्र रजनी की कहानियाँ।हे घण्टू!अपने लिए कुआँ खोदो।खोदो।अभी लग जाओ।उसमें कूँद के समाधि ले लेना।ले जाना उस कुँए में अपनी रसोई का सामान।खा पी कर मजे करना वहाँ।जिन्दा बनी रहोगी।मैं न आऊँगा वहाँ।मैं तो और मिट्टी से दबा दूँगा। हे लोमड़ी!तुम्हारे लिए अँगूर खट्टे ही रहेंगे।हे मौन की देवी!तुमने स्वयं को उस प्रसंग से भटका लिया है जहाँ कुछ कौतुक की संभावना थी।तुम लील गई उस स्वच्छ संवेदना के मार्मिक रहस्य को।जिसमें किसी देव को भी चुप कराने की भी सामर्थ्य थी।कोई संवेदना प्रकट न होगी अब तो कोई देव भी प्रकट न होंगे।तुम शान्ति को खोजो।अपने अन्तः में।चतुराई से।
©®अभिषेक पाराशर

Language: Hindi
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