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10 Sep 2022 · 4 min read

💐💐प्रेम की राह पर-63💐💐

महत्व का निर्धारण असीमित तब मालूम पड़े जब वस्तु की न्यूनता हो या फिर आप की किसी से सम्बन्धों में प्रगाढ़ता हो।महत्व की उर्मि न्यूनता में अवश्य ही उत्पन्न होगी।महत्व का निर्धारण उस प्रमाण से अधिक हो जो ईश्वर की व्यापकता से जुड़ा हो।निरन्तर अग्नि की तरह जलते रहना,परमार्थ के लिए,वह भी कहीं न कहीं महत्व बुद्धि रखता है।किसी चुनाव को अपने जीवन में इस तरह से न लो कि उससे अनावश्यक अशुद्धियों का उद्भव हो।उसे चुनाव का रूप तब देंवें जब अतिशय प्रेम का अथवा कार्य का प्रमाणिक होना संलग्न हो।इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए निरपेक्ष होना जरूरी है।सुतरां इस तरह की जरूरत तब और उपयुक्त बैठती है जब निश्चित रूप से आप विमल मति का प्रयोग करते हैं।किसी विषय वस्तु को अंगीकार करने में कोई हर्ज़ नहीं होता है।परन्तु उसमें मनोनुकूल आदर्श हों अथवा हमारे ठवन पर वह समुचित लगे तो ठीक है।नहीं तो किसी भी मार्ग से उसका व्यवहार नैसर्गिक न होगा।सदैव मन को आक्रान्त ही करेगा।विविध भय देगा।क्लेश देगा और क्षण-क्षण शोक की चूलिका भिन्न-भिन्न वेश में देगा।ढोल को ठोंकते रहो,जब बजाना नहीं आता तो ठोंकना ही कहेंगे,तुम्हारे जैसे सुर निकालेगा।क्यों रूपा?किसी अनुपमेय कृत्य की देवी हो।तो हमें भी उन कृत्यों की गणना का मार्मिक गीत अपने कण्टकमुख से सुनाओ।कमल मुख तो कहूँगा नहीं।क्यों कि कोई भी यथा पंकजानुभूति तुम्हारे कृत्यों से अभी तक इन श्रवण इन्द्रियों में न हुई।शब्दों के सूखा तुम्हारे ही पक्ष में हैं।जहाँ विचारवान बादल कभी न बरसेंगे और कभी न लहलहायेगी चित्त को प्रसन्न करने वाली वार्ता की खेती।इस भावनात्मक सम्बन्ध को प्रगाढ़ करने में हे रूपा!तुम प्रवीण नहीं हो।यदि झूठ के लिए कह दूँ कि तुम महाप्रवीण हो तो स्वयं को यातना देने से कम न होगा।इस विषय में किसी प्रकार की दक्षता का मंगलमयी अवसर और स्वत्वसहित व्यवहार किसी भी विधा का रोचक ढंग से प्रस्तुत न किया गया।इस प्रकार की आधुनिकता किसी काम की नहीं है।जो किसी भी स्तर पर उन नयनाभिराम और हृदयस्पर्शी मुक्त शब्दों के मंजुल स्पर्श को एक नवीन दिशा न दे सकी।तुमसे अभी तक कोई भी लालित्य से भरा अलंकारिक एक शब्द न सुनाई पड़ा और न दिखाई पड़ा।तुम भावना प्रेषण की विद्या में अनपढ़ हो।महा सिद्ध फट्टू हो।फट्टू।तुम सोचते होगे कि फट्टू,तुम कहते रहो,तुम बड़े दैन्य प्रतीत होते हो।तो मैंने फिर कहा तुम फट्टू हो।महा फट्टू।किसी जीर्ण भग्नावशेष से,तुम्हारे दोगले ज्ञान की तरक़ीब ख़्याली लड्डू बनाएगी।जिन्हें मैं तो देखकर खाऊंगा नहीं पर तुम माया के वशीभूत हुई खाओगी पुनः पुनः।परन्तु भावना की भूख कभी न शान्त होगी और सुनो अपना सुनियोजित अध्ययन पूरा कर अपने गाँव लौट जाना।वहाँ उगाना लौकी और उस पर करना शोध।लौकी की वल्लरी में पानी देने की जरूरत न पड़ेगी तुम्हारे आँखों से निकला आँसूओं का लिक्विड यूरिया,पोटाश,जिंक और विविध खाद युक्त लवणीय जल जब खेतों में जायेगा तो देख लेना लौकी न उगेगी।लौका उगेगा लौका।तुम्हारे तात प्रसन्न होकर कहेंगे हे वत्स!यह शस्यकला कहाँ से सीखी तुम पढ़ तो कुछ और रहीं थीं।तो फ़ोटो खींचना आता ही है और विविध पक्षियों की आवाज़ भी।तो केंका की आवाज़ में कें कें कर के और तुम ठगी सी मुस्कान देकर अपनी कान्ति युक्त बत्तीसी का शानदार प्रदर्शन कर देना।तभी तोता आएगा और तुम्हारे दाँतों में चोंच मारकर भाग जाएगा।यह सब कभी न उपराम होगा। यह यात्रा चलती रहेगी।इसके यात्रा के यात्री सर्वदा चलते रहेंगे।कोई विशेष प्रयोजन तो न होगा, इस यात्रा की विशेष लक्ष्यधारी तिथि न होगी।दोनों यात्री कुशलता से अनन्य चिन्तन का परामर्श करते हुए इस यात्रा से विदाई लेंगे।कोई दोष न होगा इस विदाई के रहस्य के जानकारों का।वह अपनी सामान्य सामर्थ्य से इसे सोच सकेंगे।निरर्थक प्रकल्प चलते रहें तो भी इस यात्रा की लघु दूरी कभी बाधित न होगी।कूँजता रहेगा उन पक्षियों का कलरव जो समय-समय पर आनन्द के रचनाकार रहे।सभी कल्मष निर्धूत हो जायेंगे।कोई तरक्की का प्रशय भी न रुकेगा।एकान्त भी किसी भी प्रकोप से पीड़ित न होगा।इन यात्रियों का।कोई रूपक न जँचेगा इन पर।सरलता का चंदोपा तना हुआ है इन पर।तो समर्पण के आज्ञा की जरूरत है केवल।जिसे अपने अन्तकरण से विविध व्यंग्य और सुखदरुप से तराशी गई उन भावनाओं के भवनों का सरोकार निश्चित ही बैठाना होगा।यह तथ्य कहीं न कहीं प्रेरित करेंगे उन सभी विचारों को जो अंकित हैं रूपा तुम्हारी निष्ठुर हृदयशिला पर।फिर भी तुम कयास लगाते रहना जिसका कोई प्रेरणादायी आन्दोलन और संकल्प की शिक्षा कभी न उकेरी जाएगी इन नश्वर जीवन की पुस्तिका पर।यह पुस्तिका तुम्हारी कमी का पर्याय और तुम्हारे ही अज्ञात के प्रति शत्रुभाव से प्रेरित होगी।किसी भी चारुता से आप्लावित तथा सन्देह की सीमा से लंघनीय बन जाएगी।चिन्तन के अभाव में किसी रहस्य से जीवन का पर्दा न उठेगा।सभी प्रसन्नता के सितारों का टिमटिमाना स्वतः ही बन्द हो जाएगा।अज्ञानजनित भीति शब्दों की कुशलता को बड़ी चतुराई से हर लेगी।अवगुणों की सेना का आक्रमण शनैः शनैः तुम पर प्रक्षिप्त आक्रमण कर तुम्हें पीड़ित करेगा।तुम निरन्तर किसी की चाहना करोगे तो तुम्हें कोई भी निर्मल न नज़र आएगा।बस टूटते रहना और बिखरते रहना।चतुराई से।
©®अभिषेक पाराशर

Language: Hindi
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