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💐बोधाद्वैते एकता भवति प्रेमाद्वैते अभिन्नता भवति च💐

प्रेमे स्वस्य स्वीकृति: भवति।वासुदेवः सर्वम्-एषः ज्ञानेन भवति।परं एषः ज्ञानापि भक्तया भवति।गोपिकानां प्रेमे ज्ञानापि।”न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनां अन्तरात्मदृक्-श्रीमद् भागवत-10.31.4।यथा रक्तवर्णस्य ‘ऐनक’इति धारणं कृत्वा सर्वा: वस्तूनि रक्त एव रक्त दर्शनं भवति।एतादृशः गोपिका: नेत्रै: सर्वाणि स्थानानि कृष्ण: एव कृष्ण: दर्शनं अभवत्।कारणं यत् गोपिकानां नेत्रेषु कृष्णस्य मूर्ति: मुद्रयति अर्थात् बोधाद्वैते एकता भवति प्रेमाद्वैते अभिन्नता भवति च।

©®अभिषेक:पाराशरः

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