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31 Aug 2022 · 3 min read

💐प्रेम की राह पर-60💐💐

पृथ्वी पर मानवीय मंगल न कर सकने वाला मानव,मंगल पर मानव को बसाकर मंगल करना चाह रहा है।कितना जाहिल है।यह कोई खोज नहीं।मानवता को शर्मसार करने का विषय है।भूखे लोगों की भूख दूर न कर सके,तन पर वस्त्र न दे सके।मंगल पर कॉलोनी बनाएंगे।धूर्तों परमात्मा तुम्हारी वैज्ञानिकता पर हँसते हुए एक अलग नरक की रचना करेगा।उसमें भोगना यातनाएँ।वहाँ खेलना अमांगलिक होली।दासता मनुष्य के अन्दर बसती है।दासता के भी जनों के अपने अनुभव होतें हैं।वे अनुभव या तो कटु अनुभव लिए होंगे या फिर चुनौती से चमकते मनुष्य का प्रेरणादायक मुखौटा।’किसी रोज उनसे मुलाक़ात होगी’नामक गीत में एक लघु अंतरा आता है।’ओब्ला डी, ओब्ला डा’जिसका अर्थ है “लाइव्स गोज ओन”।यह शब्द नाइजीरिया की योर्वा ट्राइव्स द्वारा बोला जाता है।जिन्दगी चलती रहती है।इसमें कोई शक नहीं हैं।परन्तु कैसी चलती है यह जरूर परिस्थितियाँ बताती हैं।निश्चित करतीं हैं उसके वर्तमान और भविष्य का दर्शन।अन्दर से टूटा मनुष्य भी प्रसन्न हो सकता है।विषाद के द्वार पर टुक-टुकाती उसकी बुद्धि उसे प्रसन्नता से उसके ही व्यक्तिगत साहस से अभिभूत करती है।उसे प्रेरित करती है।उसे हर वह वस्तु के प्रति अपना नज़रिया देती है।वह मानव उस नज़रिया के माध्यम से प्रसन्नता को खोज लेता है।स्थान-स्थान पर विनोद करता है।ज्ञान का आश्रय लेकर वह दुःखी रहकर भी दुःखी न रहता।उसे जानना आ गया है कि इस वसुन्धरा पर कोई सुखी नहीं है।वह जानता है कि शहरों में बनी यह सभी ऊँची-ऊँची हवेलियाँ गम्भीर रोगों की वाहक हैं।कोई मधुमेह से ग्रसित है कोई कर्क रोग से।सभी खा रहे हैं अंजुली भरभरकर भेषज।अर्श रोग तो प्रत्येक को है।अर्श रोग का अभिप्राय इतना ही समझिए कि पीड़ित मान्यवर के चेहरे पर दर्द सहित प्रसन्नता साफ़-साफ़ झलकती है।अंदरूनी दर्द के मारे वह प्यारा जाने की क्या-क्या नहीं सहन कर सकता है ।भावनाओं का सार्थक वेग स्थिर हो जाता है जब अपने ही जन उन भावनाओं का मज़ाक बनाएँ।किसी कर्म में हर समय गदर्भ की तरह लगे रहना बौद्धिक कौशल नहीं है।शनै: शनैः स्व असफलता का एहसास इस तरह किस-किस परिधि की परिक्रमा करता रहा किस-किस से सत्य की आहट सुनाई दी वह सबसे प्रबल,व्यक्तिगत रूप से धन का अभाव होना थी।उस समस्या का इलाज शायद ही मैं कर सकता था। हनुमन्त के अलावा मेरी वृत्ति किसी से भिक्षा लेने की नहीं रही है।मैं उनका यदि हूँ तो हूँ।मेरे कृत्य कोई भी अपौरुषेय नहीं हैं।सर्वस्वता मैं हीन व्यक्तियों में भी मैं सभी में अन्तिम व्यक्तियों में हूँ।किसी को प्रभावित करने का कोई विशेष प्रयोजन न पाला कभी।दूसरों को समझकर हमेशा आगे बढ़ जाना।शायद सम्बंधित व्यक्ति में कोई प्रतिभा छिपी हो।विषयों की बयार सबमें उठती है तो बच मैं भी नहीं सकता।हनुमन्त से कहा मैंने इस संसार में साधु न बनने दोगे और मैं तो आपका हूँ तो आप काम-क्रोध-लोभ-मोह आदि से भी तो परिचय कराओ।नहीं तो इन सभी की नैसर्गिकता का छोटा से भी अनुभव न होगा।यदि आप सही हैं और भक्ति से ओतप्रोत हैं तो सत्य मानिए कि यह नरक के द्वार काम क्रोध और लोभ सीमित बनकर आपका सहयोग करेंगे और आप कभी प्रभावित भी न होंगे।सावधान रहना उस प्रत्येक व्यक्ति से जो तुम्हें और तुम्हारे कर्मों को बहुत ही महीन तरीकों से गौर कर रहा है।आह्लादक तो उस ईश्वर की हर एक सत्त्ता है।प्रसन्नता किसी एक के हिस्से में नहीं बँटी है।परन्तु अन्वेषक बनना पड़ेगा उस हेतु।तो हे तरुणी तुममे प्रसन्नता को खोजकर तुमसे कभी प्रसन्नता का उद्गम न देख सका।कोई विशेष तथ्य न मांगें और न हीं स्वयं बनाएँ।तुम्हारी टीम बार-बार एक विशेष बैंक का और एक गेम का मैसेज समय-समय पर प्रेषित करती रहती है।परन्तु इन सभी से कोई निष्कर्ष नहीं निकलने वाला।ज्ञात है कि वह समय ज़्यादा दूर नहीं है कि जब तुम यह सोच सकोगे कि एक तूफान के साथ सब कुछ नष्ट हो गया।मैं जानता हूँ इस बात को कि मेरी सफलता मार्ग मेरे विवाह के बाद ही तय होगा।कोई कितना भी विषभरा प्रयास मेरे प्रति करले परन्तु परिणाम भी उसकी सोच की परिधि से बाहर ही होगा।मुझे यह भी ज्ञात है कि मेरे शत्रु पीछे से बार करेंगे।परन्तु वे धूर्त कुछ न बिगाड़ सकेंगे मेरा।वे अपना ही हानि करेंगे।अन्तिम में, गुंजन की चतुराई किसी समझ की नहीं है।चतुरता सही विचारधारा से ही पगी होनी चाहिए।

©अभिषेक पाराशर

Language: Hindi
68 Views
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