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💐प्रेम की राह पर-33💐

13.1-मेरा तुम्हारे प्रति अग्रसर होना विवेकजन्य था और उस विवेकजन्य पथ पर तुम्हारे हित के ही मेधा सहित विचारों का ही उद्रेक हुआ था।जिनमें लेशमात्र भी असत भावना का अंकुर नहीं था।किसी बात और वस्तु का संचय किया जाना उस संकेत का द्योतक है कि इस ईश्वरकृत श्रेष्ठ दोपाद प्रजाति में अपरिग्रह का निश्चित ही अभाव है। चूँकि तुम्हारे अन्दर इस त्याग की पवन किस दिशा में बह रही थी तो तुम्हारी उस क्षण में स्थित दशा ने तय कर दिया था।हे मित्र?तुम काफी समय से मेरे शब्दों को अपने सुवलययुक्त कानों में और कूपसदृश गहरे नेत्रों में स्वाज्ञा से निरन्तर प्रवेश कर रहे थे।भले ही मैं स्वशब्दों को सन्देशशिला पर परमार्थिक, द्वेषरहित और निसर्ग की श्रेष्ठ प्रेरणा से उत्कीर्ण कर रहा था, परं तुमसे जैसा मेरे मन ने चाह की थी कि ऐसा उस धृति की सजीवता लिए हुए तुम्हारे साहस से ऐसा रूखा प्रतिउत्तर न मिलेगा।पर सीमितपरिधि के उन शब्दों ने मेरे उस सजीव,ताज़ा और प्रणयलावण्य वाली बगिया को तुमने तहस नहस कर डाला और तहस नहस कर डाला वह विश्वास जो शायद ही किसी विशेष के प्रति प्रकट हो।संयम शुद्ध स्मृति ही ईश्वर के मार्ग का दर्शन करा सकती है।परं तुम्हारी स्मृति कहाँ स्थित थी।तुमसे प्रकट हुए उन अविश्वसनीय शब्दों के मकड़जाल ने मेरे हृदय को ऐसा दुःखी किया है कि उसको यह दिलाशा कि तुमसे भी यह सब हो सकता था,नहीं दी जा सकती है।यह ऐसा धब्बा है जिसे हायड्रोजन परॉक्साइड भी कभी विरंजित न कर सकेगी।मैं विवर्धित स्वर में चीख भी नहीं सकता हूँ।हास्य मेरा स्तब्ध है।रुदन अंतःकरण को भिगा रहा है।चेतना ऋणात्मक सीमा के अंदर है।पीड़ा के साथ विशेष कम्पन्न का प्रभाव है।जो मेरे विचारों को एकाकार नहीं होने दे रहा है।परन्तु इन सभी में तुम्हारा ही हाथ दृष्टिगोचर होता है।इस सभी में मैं स्वयं को असहाय की श्रेणी में पाता हूँ और देखता हूँ प्रलय जैसा पतन।तुम्हारा उत्थान तुम्हें मुबारक हो।मैं इसे हे मित्र!तुम्हें अग्रिम देने में संकोच न करूँगा।तुम इसे सजीव ही मानना।यह मेरा निर्वेद ही है जिसने तुमसे अभी तक मिलने के प्रकल्प को जीवित रखा है।सम्भवतः मेरे गूढ़ाक्षर तुमसे अलग नहीं हो रहे होंगे।वह भी तुम्हारे लिए ही समर्पित हैं।क्षमा वीरोचित धर्म है।उसे भी माँग सकता हूँ।परन्तु तुम्हारे धर्म ने क्या?क्षत्राणी के सदृश किसी धर्म का पालन किया।इस तथ्य में बड़ा अफ़सोस होता है। जिसे तुम भले ही काल्पनिक मानते रहो,अपने क्षुद्र मन से।परन्तु उसे मैं कैसे ऐसा कह सकता हूँ।क्योंकि यह तो मैं स्वयं हूँ।परन्तु तुम्हारे इस क्रियाकलाप से मेरी भाव की गंगा में परिवर्तन हुआ है और वह तुम्हारे शब्दविष से दूषित और विषव्याप्त हुई है।आनन्द के एकता की मेरी इस क्यारी को तुमने अपने तरीके से नष्ट कर डाला और कर डाला उसका उपसंहार कार्बनमोनोऑक्साइड जैसा मेरे सन्देशों को फैलाकर चहुँ ओर।हे प्रिय मित्र? मैं इस पर भी तुम्हें हे मित्र! ही बुलाऊँगा।क्यों जानते हो?यह यदि मेरी कमी रही है तो एक सच्चे मित्र का कर्तव्य उन कमियों को सुधारने के प्रति सावधान कर देना है।मैं तुम्हें अपना मित्र ही मानूँगा भले ही दोष तुम अगणित क्यों न गिनो।तुमने कभी क्या यह मनन किया कि मेरा द्वारा छेड़ा गया यह वक्तव्य की तुमने मेरे प्रोफाइल पर झाँका, सत्य कथन करना कि इसमें असत्य का आधार कितना है।यह सत्य ही तो है।यह विनोद नहीं है तुम्हें क्या है कोई मरे या जिए इस संसार में?तुम निष्ठुर जो हो।इसमें भी महा होना अभी शेष है।तुम निरुत्तर तो न रह सकोगे अधिक समय तक।क्यों कि तुम्हें भी इतना घटित होने के बाद ग्लानि के दुर्ग पर अजेयता सिद्ध करनी होगी।।इस अजेयता को अतिसय और प्रखर बनाने के लिए व्यवहार विन्यास की आवश्यकता होगी।परन्तु इस व्यवहार विन्यास में अभी तक अपना सिध्दानुभव प्रदर्शित नही कर सके हो।फिर इस वार्ता को आगे बढ़ाना तुम कैसे जारी रख सकोगे।निर्देशांक ज्यामिति में मूल बिन्दु से जाने वाली रेखा के कोर्डिनेट्स शून्य होते हैं।तुम अनुभव के विषय में मूलबिन्दु की रेखा ही हो।तुम कभी यूनिवर्सल सेट न बन सकोगी।हे प्रिय मित्र!मैं अन्दर ही अन्दर घुटता नहीं हूँ।पर तुमसे चन्द प्रश्नों के उत्तर न पा सका।या तो तुमसे वे आते नहीं हैं या फिर तुम्हारी मुझ में रुचि न होने के कारण उन में भी रुचि नहीं है।प्रयोग की सिद्धि भी अनुभव के धरातल से ही त्वरित प्रकट होती है।अन्यथा प्रयोग अप्रयोग ही रहेगा।यह साधारण कथन हैं परन्तु इन्हें तुम क्या समझ रहे हो तुम ही जानो।मैं इसे तुम्हारे किये एक आदर्श की चुनौती के रूप में प्रस्तुत करूँगा।इसे तुम्हें अंगीकार करना होगा।उस साहस के साथ जिसे तुमने अपने प्रतिउत्तर के दरम्यान विरोधी शैली में प्रेषित किया था।यह सब तुम्हारी मजबूती है या फिर कमजोरी इसे किन प्रयासों के साथ समझा जा सकता है।इसे तुम्हारी मूर्खता ने सिद्ध किया है।तुम्हारी मूर्खता की क्या कसौटी है इसे कैसे हिसाब में लिया जाए।

©अभिषेक: पाराशरः

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