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💐प्रेम की राह पर-30💐

16-आत्मश्लाघा तो तुम ही अपने लिए कर लेते होगे।उस आत्मश्लाघा में क्या मेरे अंश का लेशमात्र भी नहीं है?,है और निश्चित है।तुम उस परिसर के प्रति अल्पज्ञ हो।तुम इस अपनत्व को जड़ मानते हो या चेतन।यदि तुम जड़ मानते हो तो इस प्रणयरणक्षेत्र से भाग जाना तुम्हारे अल्पानुभव और अल्पायु के द्योतक हैं।प्रतिद्वन्द और प्रतिशोध में महान अंतर हैं।यह अंतर तैरती और डूबती तरणि जैसा है।तैरती नाव से यदि यहाँ परामर्श किया जाए तो उस पर बैठे सत्य यात्री को उस शांति का अनुभव होगा जिसे वह इतर किसी भी स्थान पर कभी न प्राप्त कर सकेगा और डूबती नाव प्रतिशोध का परामर्श करती है उस पर बैठा यात्री भाँति-भाँति की चिन्ताओं,डूबने की भीति,,ईर्ष्या और न जाने कितने मिथक अपने में रखता है।बे-वज़ह की खराबी हैं प्रतिशोध में।संध्याकाल में शयनस्थान में स्थित ज्योति पर उड़ती बर्र को शयन काल में यदि न मारा गया और यदि उसे उस स्थान से बहि: न छोड़ा गया तो निश्चित ही वह पीड़ा देगी और यदि गलपटे को सुजा दे तो कोई बड़ी बात नहीं है।यथा समय यदि उसका निदान न किया गया तो वह अवपीडक क्लेश देगा।यहाँ यह उक्त प्रसंगों का निर्वचन कह देना इसलिये आवश्यक हैं कि क्षुद्र धरातल पर सृजित प्रेम प्रतिशोध, ईर्ष्या, भय, चिन्ता आदि दुर्गुणों को समेटे हुए होता है।चिन्ता तो उसके मूल में दीमक के रूप में लगी रहती है।सुतरां शुद्ध प्रेम निर्दोष होता है। प्रेम का अंजन यदि चक्षु पर चढ़ा हो तो हर वस्तु प्रेम ही है।यदि यह अंजन दूषित होगा तो इसमें निर्दोषता कैसे कह सकेंगें।विविधता को एक करते हुए प्रीति की स्थापना करना उसे स्थिर करना फिर उसे गुणात्मक रूप से वर्धन करना,उन आदर्शों के साथ जिसे समाज में समय समय पर सम्मान मिले आदरोचित है।एक पखवाड़े के लिए आये हुए बसन्त के लिए कवि अपने कलम को खोल देता है।परन्तु उस पतझड़ का कोई तो स्थान दो,आधार तो वह भी नई कोपलों का तैयार करता है।उस बयार की कोई भूमिका ही नहीं है क्या? जो प्रसून की सुगन्ध को बिखराकर मन को आकर्षित कर दे।तो दो उस तूफान को वाह-वाही जो उखाड़ देता है उस शिशु से प्यारे वृक्ष को समूल।फिर हे मित्र! तुम ही तय करो कि तुम बसन्त हो,पतझड़ हो,बयार हो या तूफान हो।यह भी संज्ञान में लाना जरूरी है कि बुराई में अच्छाई भी दर्शनीय है।प्रतिबिम्ब को कभी अट्टहास करते देखा है क्या?फिर जन के समक्ष वह भीति को क्यों उपस्थित करता है।कृष्णवर्ण का आधार लिए हुए है इसलिए।।परं बाल मन तो उससे भी क्रीड़ा करता है।क्यों पता है?उसे क्रीड़ा से प्रेम है।क्यों है? वह नहीं जानता है।बस मेरा भी तुम्हारे प्रति आकर्षण का भाव क्यों था। मैं किस दृष्टिकोण से इसे तुम्हारे समक्ष निवेदित करूँ।परित्यक्त जैसा अनुभव करता हूँ।कोई अनवधानता भी इस नाराज़गी के लिए जिम्मेदार न थी। निरुत्तर रहना भी एक आत्मदाह जैसा है यह चाहे में रहूँ या तुम रहो।वह मेखला तो कमजोर हो ही गई जिसकी मजबूती को तुम कभी सहन ही नहीं कर सकी।तुमसे अच्छा तो एक अंधा मनुष्य है कम से कम सही तो बोलता है।प्रेम से।तुमने इतने अवसाद कुछ क्षणों में दे दिए जिन्हें में कैसे अपने झोली से निकालूँ।झोली सहित जो दिए हैं।झोली भी तुम्हारी और अवसाद का दान भी तुम्हारा।फिर इस दोहरे मार की आशा इस प्रेमक्षेत्र में तो नहीं थी।इस प्रेमक्षेत्र और कुरुक्षेत्र में कोई अन्तर न रहा।अब जब तुमने इस प्रणय सूर्य को अस्त कर दिया तो मैं अब अर्घ्य किसे दूँगा।कैसे अन्त होगा मेरे क्षुद्र जीवन में तुम्हारे प्रति हुए पाप का प्रायश्चित।तुम भोलेभाले रहो।मैं ही पापी हूँ। अब इस विभावरी को मेरे जीवन में लाने के लिए तुमने प्रेम के हर प्रकाशित मार्ग को बन्द कर दिया हे मित्र।अब इस अंधकार के साथ ही मैं भी सदैव के लिए अंधकार हो जाऊँगा।

©अभिषेक पाराशरः

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