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11 Nov 2022 · 1 min read

👁️✍️वाह-वाह तुम्हारे आँख का काजल✍️👁️

वाह-वाह तुम्हारे आँख का काजल,
वाह-वाह तुम्हारे आँख का काजल,
भँवर जैसे पड़ रहे हैं कालिमा के
पलक पर जैसे बैठी हों कोकिलें,
हृदय में जल रहा हो दीप मेरा,
लौ का प्रकट होता कृष्ण वर्ण
लौट आया हो जमीं पर, काली घटा से युक्त सावन,
वाह-वाह तुम्हारे आँख का काजल।।1।।
दिया हो दान अमावस ने स्वरंग का,
रात्रि की छाया पड़ी हो स्वरंग की,
दूर उड़ते पक्षी जैसे जुट गये हों,
देखकर तेरे नयन को हम लुट गए हों,
अलक के रंग की ही रेखा खिंचीं है,
नायक ने देखा,सहसा कह उठा ‘मनभावन’
वाह-वाह तुम्हारे आँख का काजल।।2।।
चींटीयों के श्रम का प्रतीक बनकर,
गुँथ गई हैं एक दूजे से मिलकर,
शेष बचती,उनसे वह पंक्ति काली,
लिखा हो नाम मेरा नेत्र पर,
जैसे संभाले क्यारी बाग का माली,
आँसू भी उसका संग पाकर बन गए पावन,
वाह-वाह तुम्हारे आँख का काजल।।3।।
भय न देकर उत्साह देता शुद्ध यह है,
क्षणभर भी देखा तो बनाता बुद्ध यह,
क्रोध को तो शान्त कर यह शान्ति देता,
टकटकी भर देखना हो तो कान्ति देता,
देखता हूँ इसे सचमुच स्वयं को शान्तकर,
टपक रहा हो इससे शुद्ध पूर्ण लावण्य।
वाह-वाह तुम्हारे आँख का काजल।।4।।
©©आभिषेक पाराशरः

Language: Hindi
Tag: गीत
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