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🍀🌺प्रेम की राह पर-43🌺🍀

चलो मानता हूँ कि मैं संसारी प्रेम में अस्पृश्य हूँ।तो तुम भी उस ईश्वरीय सान्निध्य से वंचित रह जाओगे।जिसे सम्भवतः तुम्हें उपलब्ध कराता।तुमने उन सभी निन्दनीय कृत्यों का आरोहण किया जो एक शिक्षित से अप्रत्याशित था।गाम्भीर्य विषयों के प्रति यदा जब एक नर अपने शब्दों का निर्वचन करता रहा और वह सब सत्य की शिला पर उत्कीर्ण सत्यवाक्य ही थे।उनमें रत्ती भर भी किल्विष का बोध नहीं था।इतना भयभीत कर देने वाला शब्दशः आक्रमण वह भी उससे जो अपनी सभी हृदय कोटर में पड़ी हुई वार्ताओं को तुम्हारे सम्मुख प्रस्तुत कर रहा है।क्या कोई उपहास है?साथ ही उन सभी स्थानों की गमन की दिशा भी निर्देश कर रहा है।तुम्हारे ओर से कोई भी सजीव व्यवहार,विचार,भावना, सांत्वना का कैसा भी विमर्श सहज ढंग से प्रस्तुत नहीं किया गया।काहे का शोध है तुम्हारा।जब मानवीय व्यवहार का सम्यक शोधन नहीं कर सके।किसी वार्ता विषय को स्पष्ट रूप से भी मना किया जा सकता था।इतना शक्तिशाली प्रहार।कौन ऐसे व्यवहार को प्रस्तुत करेगा।तुम्हें सुन्दरता का दम्भ हो या अहंकार हो तो सुनो तुम इतने भी सुन्दर नहीं हो।ऐनक के पीछे तुम्हारे चक्षुओं की सूजन क्रिया सब वर्णन कर दे रही है।हे तिलकुटी!मैं स्वयं स्त्री के अन्तः प्रक्षिप्त स्त्री,पुरुष और पुरुष के अन्तः स्थित प्रक्षिप्त स्त्री,पुरुष की भावनाओं में संगति की स्तुति करता हूँ।फिर वह कितनी एक दूसरे से मेल का प्रयोजन सिद्ध कर रहीं हैं।यह देखता हूँ।एक मात्र सुन्दरता पर ध्यान देना वासना है।मैंने तुम्हारे आत्मविश्वास से प्रेम की संगति मिलाने की चेष्टा की और इस हेतु उस उद्यम को शब्द के रूप में तुम से कह दिया।तुम उसके मनोरंजन के रूप में लेते रहे।उन गोपनीयताओं को ऐसे प्रस्तुत कर दिया संसारी लोगों के सम्मुख जिनके लिए धन ही सब कुछ है और फिर नाबालिगों की आर्मी इकठ्टा कर रखी है।यही तो है संसारी प्रेम और पार लौकिकप्रेम में अन्तर।।संसारी प्रेम में कई सुनेंगे। पारलौकिक प्रेम में दिल की बात एक वही दिलबर जानता है जो सबके दिल में है।प्रहृष्ट होकर ही मैंने अपने विचारों को तुम्हारे सामने प्रपन्नवत होकर रखा था।यह वही शब्द हैं जिन्हें मैं ईश्वर के सामने ही प्रस्तुत करना चाहूँगा।इसमें कल्पना का सृजन नहीं था।नहीं मैं तुम्हें स्वशब्दों से प्रभावित करना चाहता था।यह सब मेरा अपना है।ईश्वर का दिया हुआ।मैंने इसे कैसे एकत्रित किया है किसी मंच पर जाकर इसकी व्याख्या कभी नहीं करूँगा।जो मुझे अच्छा लगेगा जो इसके योग्य होगा उसे दूँगा।लोमड़ी वाली कहावत कि न मिले तो अँगूर खट्टे हैं,तो आईएएस बन जाने पर कितने जिलाधिकारी बिना मिठाई के जिले में आ जाते हैं।एक भी नहीं।अपवाद के रूप में एकार्द्ध हो सकता है।हाँ,मैं क्यों बनना चाहता था तो वह यह था कि यह पद निश्चित ही उन सभी सेवा सुश्रूषा के कृत्यों को वरवश देने के लिये और उनमें संलिप्त हो जाने के लिए प्रेरित करता है।फिर फिज़ा और भी रंगीन हो जाती है कि जब आप भी पूर्व से ही ऐसे परमार्थिक कृत्यों को करने के लिए तैयार हों।एक मात्र यही मेरी भावना थी।सन्तुष्ट तो इस सेवा में भी हूँ।परन्तु इसमें दूसरों के हित का आधार अल्प है।शंकित तो नहीं हूँ परन्तु अब मैं एक जीवन्त रहबर की तलाश में हूँ।फिर ऐसा क्या कि जीवित भी मिले और मननशील विचारों की मेधा से मरा हुआ भी।कहीं ऐसा मिले कि रात दिन मेरे सरलता को देखकर मेरे रक्त को ही चूसे।तो मैं तो हो जाऊँगा कुपोषित।मैंने अपना जीवन बड़ी सादगी से जी सकता हूँ और जिया भी है।परन्तु विगत दो वर्षों ने मुझे एक ऐसे कटु अनुभव से गुजारा है कि रक्तसम्बन्धों में रुचि अस्थायी बना दी है।कोरा ढोंग ही नज़र आता है और मित्र मंडली की बात करें तो उस दूषित मानसिकता वाले मनुष्य के यहाँ दिल्ली में रुका,उसके कृत्यों ने तो इस पृष्ठभूमि को ही समाप्त कर दिया कि संकट में आपका शोषण भी किया जा सकता है।ख़ैर यह सब भूल जाने वाली घटना है।आनन्द तो अन्दर छिपा है उसे ढूँढो और यह क्या है कि तुमने लेखन बन्द कर दिया है क्या।तो प्रस्तुत करो अपने लेखन के उदाहरण।साहस ही नहीं है।अपनी किताब तो अभी तक नहीं भेज सके हो।रुपये दे दूँ।लिफ़ाफ़े पर टिकट लगाकर गाँव के पते पर भेज दूँ।किताब तो भेज दो।मोहन तुम्ही कुछ करो।तुमने अभी तक अपना पीताम्बर नहीं दिया और इस लोमड़ी ने अपनी किताब।तो मैं ज्यादा ग़रीब हूँ।दोनों लोगों के लिए।तुम दोनों की शिकायत करूँगा।आगे क्या होगा मुझे नहीं पता।कोई उधार कथन ही दे दो।दोनों में से।कैसी भी कोई दिलाशा।दोनों ने एक कृत्य का अनुपालित नहीं किया तो दोनों झूठे हो।देख लो।झूठों मैं गिने जाओगे।मैं तो हूँ सच्चा मैंने तो एक लड़की से शादी करने के लिए भी कहा इसको स्वीकार किया।तुमसे पिताम्बर की कहा।दोनों में से एक का कर्कश उत्तर मिला है और दूसरे का उत्तर अभी तक मौन है।तिलांजलि तो किसी को भी न दूँगा अभी।एक के मन की भी नहीं जान सका हूँ।जाने क्या-क्या बाँट दिया है मेरे हिस्से में।कोई सीधी मुँह बात भी नहीं है।अभिषेक तो जिसके भाग्य में है उसका ही होगा।कृष्ण तुम अपना पिताम्बर दो।

©अभिषेक: पाराशरः

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