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Nov 7, 2016 · 1 min read

१३५ : अंतस जब दर्पण बन धुँधलाता यादों को — जितेंद्रकमलआनंद ( पोस्ट१३५)

अंतस जब| दर्पण बन धुँधलाता यादों को ।
विरहाकुलनयनों से नीर छलक आता है ।।
दामन में धूप लिए यौवन दोपहरी में —-
भटका है प्यासा ही मरुथल की राहों में ।
बीते दिन पलछिन — से स्वप्निल वे रातें भी ,
महके थे पलभर को आशा की बाहों में ।
रेशम की डोर सबल झंझा में टूटी है ।
गीतों का कसकन से , किंतु अमर नाता है ।।

चाहा था छूना जब पूनम के ऑचल को ,
आतप की छॉव बनी , जीवन दहकाने को ।
चाही थी लेना जब करवट अरमानों की ,
फूलों की सेज बनी स्वव्निल तड़पाने को ,
जीवन रस पाने की धूल हुई इच्छाएँं ,
आहत मन दर्दीले गीत विरह गाता है ।।
—- जितेंद्र कमल आनंद , रामपुर ( उ प्र )
७-११-१६——- रामपुर– २४०

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