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$ग़ज़ल

#ग़ज़ल

फ़सल पक ही रही है आंकलन क्या कीजिए यारों
नहीं हो संतुलन जो वक़्त का ग़म पीजिए यारों

लुटा दी इश्क़ में वो वक़्त की दौलत मिली थी जो
बचा है एक रब का नाम अब तो लीजिए यारों

चला ख़ंज़र कहाँ तक जा सकोगे रूह से मेरी
सुनाकर सिसकियाँ अर्ज़ी मुझे ही दीजिए यारों

बग़ावत कर रहे हो तो ज़रा घर देखलो अपना
किसी को सुन बिना सोचे कभी मत चीखिए यारों

रुलाया है सभी को आज तक तुमने हँसाकर ही
कभी रोते हुए को भी हँसाना सीखिए यारों

#आर.एस. “प्रीतम”
सर्वाधिकार सुरक्षित ग़ज़ल

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