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ग़ज़ल- ये स्वप्न ही हमें तो रुलाते हैं आजकल

ग़ज़ल- ये स्वप्न ही हमें तो रुलाते हैं आजकल
मापनी- 221 2121 1221 212
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यूँ ही हजार स्वप्न सजाते हैं आजकल
ये स्वप्न ही हमें तो रुलाते हैं आजकल

इक जानवर का खोल जो है ढोल बन गया
खुशियाँ मिले तो लोग बजाते हैं आजकल

वादा तो उनसे एक निभाया नहीं गया
जाने हमें क्यूँ पास बुलाते हैं आजकल

दौलत हो तेरे पास तो फिर ठीक है मगर
यूँ ही कहाँ वे प्यार लुटाते हैं आजकल

हमने कहा कि हम तो कुवाँरे नहीं मगर
फिर भी हमीं से प्यार जताते हैं आजकल

जबसे “आकाश” हमने हमसफर तुझे चुना
कब दिल की कोई बात छिपाते हैं आजकल

– आकाश महेशपुरी

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