Sep 29, 2016 · 1 min read

ग़ज़ल ..’.यादें बसी है आज तलक .”

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गुज़रे हुए लम्हात की ‘उस पाक साल की
यादें बसी है आज तलक ‘काले बाल की

हमने कभी पुकार लिया था अंजाने में
दिल में रही पुकार न निकली बेहाल की

आती है तेरी याद मुझको तेरी क़सम
मर भी गया न जाये आदत ख़याल की

रुख़सार पे हँसी खिलती थी कभी कभी
थी मोतियों से दांत की चमक कमाल की

भूला नहीं है मंजर कोई अभी ”बंटी ”
महफ़िल सजी है दर्दे दिल के मलाल की

*-*-*–**-*-*-**-*-*-*-*-*-*-*-*–*-*-*-
रजिंदर सिंह छाबड़ा

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