ग़ज़ल- जिसे देखता हूँ मैं छिपकर हमेशा

ग़ज़ल- जिसे देखता हूँ मैं छिपकर हमेशा
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जिसे देखता हूँ मैं छिपकर हमेशा
कि उसका रहा दिल है पत्थर हमेशा
~~~
वो मेरा नहीं हो सकेगा कभी भी
जिसे है रखा दिल के अंदर हमेशा
~~~
ये नजरें कहो कब मेरी जान लेंगी
जिसे लोग कहते हैं खंजर हमेशा
~~~
मेरी प्यास बढ़ती रही है निरंतर
भले वो पिलाये समंदर हमेशा
~~~
हँसो मेरी सूरत पे हर बार लेकिन
रहोगे नहीं तुम भी सुन्दर हमेशा
~~~
वो मिट्टी मेरी जिंदगी हो गयी है
जिसे लोग कहते थे बंजर हमेशा
~~~
जो इतराओगे तो सनम तेरे आगे
झुकेगा नहीं यूँ मेरा सर हमेशा
~~~
है “आकाश” मुमकिन मुझे भूल जाओ
मगर दिल रहेगा तेरे दर हमेशा

– आकाश महेशपुरी

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