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ग़ज़ल।तू सुलगती आग़ तो शोला बना तैयार मै हूं ।

================ग़ज़ल=================

सोच मत लग जा गले से बेक़सक दिलदार मैं हूं ।
तू सुलगती आग़ तो शोला बना तैयार मैं हूं ।

हो गयी काफ़ी नशीहत दर्द गम तनहाइयाँ वो ।
सुर्ख होठो पर सजाने के लिए सृंगार मैं हूं ।

साहिलों की गर्दिशों मे रह अकेला उम्रभर अब ।
दर्द, गम, तन्हाइयों मे हो गया खूंखार मै हूं ।

रौशनी बनकर अंधेरी रात मे आ जा सितमगर ।
आ बुझा दे आग सारी जल रहा अंगार मैं हूं ।

तू तड़पकर बेबसी मे जी रही होगी यक़ीनन ।
साहिलों पर छोड़ तन्हा आ समंदर पार मैं हूं ।

उम्रभर यूँ दूरियों से तप गयी मदहोशियाँ ।
उस रूहानी आह से पैदा हुआ किरदार मैं हूं ।

आ मिलन की कश्मकश मे सामना पुरजोर होगा ।
इश्क़ की गर धार तू तो जिश्म की तलवार मैं हूं ।

तू तरस जाएगा “रकमिश’ पा शबाबे -इश्क़ को ।
हलचलें उठती रही उस झील का मंझधार मै हूं ।

Ram Kesh Mishra

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