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हृदय का सरोवर

मेरे हृदय के सरोवर में,
सर्वदा तू विचरण करता है।
बंधा है मर्यादा का एक पुल,
जिससे तू आता-जाता है।
लालसा रहती है देखने को,
पर आंखों से ओझल हो जाता है।
निर्मल नीर में गोता लगाने की
चाहतों पर प्रतिघात करता है।

आशान्वित हैं; कभी आ जाओ,
पास तू किसी बहाने से।
छा जाएगी हृदय में थोड़ी सी रौनक,
तुम्हारे पास आने से।
व्याकुल है बड़ा यह मन,
आतुर है बड़ा यह तन।
तू थोड़े पल के लिए ही आजा,
भले ही ढांढस बंधाने को।

मुकद्दर में यदि चाहा, तो
यह अंजुम भी अपना होगा।
हमारी चाहत की खुशियों में,
यह बादल भी आंसू बहायेगा।
हमारे प्रणय के बंधन पर,
फिजा भी जगमगाएगा।
बस एक छोटी आरजू है तुझसे,
मुझसे तू न दूर जायेगा।

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