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हिंदी के लिए क्यों ‘बेवफा सनम’ ?

ध्यातव्य है, 10 जनवरी को हम 1975 से ‘विश्व हिंदी दिवस’ मनाते आ रहे हैं, किन्तु भारत में जन्मनेवाली ‘हिंदी’ यहां की राष्ट्रभाषा तक नहीं है । हालांकि देश के अंदर हिंदी दिवस 14 सितंबर को मनाई जाती है, जो कि इसी तिथि को 1949 में इसे राजभाषा के तौर पर शामिल किया गया था।

हिंदी में भोजपुरी, मैथिली, मधेसी, बुन्देली, पूर्वांचली, नागपुरी, छत्तीसगढ़ी तथा अंगिका जैसी बड़ी भाषाएँ शामिल हैं । मॉरीशस, फ़िज़ी जैसे देशों में भोजपुरीमिश्रित हिंदी ही वहाँ की द्वितीय राजभाषा है । परंतु भारत में इनका स्थान अंग्रेजी के साथ राजभाषा की है । आज संसार में चीनी-मंदारिन भाषा से भी हिंदी आगे निकल गयी है । विगत वर्ष इंडिया टुडे में दिए विश्लेषण इस भाषा के मानक को निर्धारित कर रहे हैं।

इसके बावजूद हिंदी अपने घर में ही ‘बेवफा सनम’ हैं । हम तमिल, तेलुगु, मलयालम, उर्दू अथवा बांग्ला का कहाँ विरोध करते हैं, क्योंकि कोई भी भाषा संस्कृति के रक्षक होते हैं, इसलिए त्रिभाषा-फ़ॉर्मूला सहित इसे ‘राष्ट्रभाषा’ का दर्ज़ा देकर इनका ‘अंतरराष्ट्रीयकरण’ किया जाना चाहिए, क्योंकि अबुधाबी में भी अब हिंदी भाषा को पहचान मिल गयी है, फिर अपने देश में ही क्यों नहीं ?

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