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हास्य -व्यंग्य कविता

एकबार मेरे पास आया एक भिखारी ,
इससे पहले कि उसे कुछ देता मैं भी कंजूस था भारी ।
मैंने पूरी जेब टटोलकर एक चवन्नी निकारी ,
बड़े ही गौरव और स्वाभिमान के साथ उसके कटोरे में डारी ।
भिखारी ने चवन्नी बड़े ही गौर से निहारी ,
ऐसा लगा कि जैसे उसने मुझे मन ही मन में दी हो गारी ।
उसने मेरे ऊपर एक व्यंग्य भरी दृष्टि डारी ,
मुझे लगा कि जैसे उसने मेरे सिर में चवन्नी हो दे मारी ।
या फिर शामत आगई हो हमारी ,
इतने में उसने मुझे खरी खोटी सुनाने की करली तैयारी ।
वह बोला कि तुम तो हो हमसे भी बड़े भिखारी ,
जो तुमने हमारे कटोरे में एक चवन्नी मात्र डारी ।
उसने कहा कि आज एक रुपये की क्या कीमत है ?
हमने कहा कि आज किसकी साफ नीयत है ।
वह बोला कि एक रुपये का आज आता क्या है ?
हमने कहा बस्तु और रुपये का आज नाता क्या है?
आज रुपये का अवमूल्यन हो गया है ,
इसीलिए मनुष्य भावशून्य हो गया है ।
पहले एक रुपये का काफी सामान आता था ,
तब बस्तु और रुपये में एक गहरा नाता था ।
पहले जेब में रुपया और थेले में सामान होता था ,
गरीबी में भी इंसान आज की तरह नहीं रोता था ।
आज थैले में रुपये और जेब में बस्तु होती है ,
महगाई में जनता तरह तरह से रोती है ।
आज कुछ भ्रष्ट हो गये बहुत अमीर हैं ,
कालेधन से धिकारते नहीं उनके जमीर हैं ।
आज भ्रष्टाचारी घोटालेबाजों का जमाना है ,
महँगाई काले धन वालों का एक बहाना है ।
अमीरी गरीबी में बन गयी एक बहुत बड़ी खाई है
जनता के लिए नेता हैं पर जनता उनके लिए पराई है ।
एकओर अनाज गोदामों में अनाज सड़ जाता है ,
वहीं दूसरी ओर भूख से गरीब मर जाता है ।
आज दो – जून दी रोटी को भी गरीब मोहताज है ,
भ्रष्टाचारी चोर रिश्वती गुंडों का ही राज है ।
भ्रष्ट सिंघाशन को झेलना जनता की मजबूरी है ,
सत्ता परिवर्तन के लिए जागरूकता लाना बहुत जरूरी है ।
(प्रस्तुत कविता उ0प्र0 के विशेष सन्दर्भ में )
:- डॉ तेज स्वरूप भारद्वाज -:

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