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28 Jun 2022 · 1 min read

हवा का हुक़्म / (नवगीत)

उस हवा का
हुक़्म था
घर-घर समेटो ।

इस हवा का
हुक़्म है
धर-धर समेटो ।

गाल चींथो,
कान नोंचो ।
पेट-सी
आँतें खरोंचो ।
आदमी की
आँख नोंचो ।
पंछियों के
पाँख नोचो ।
ये हवा जो
उत्तरी है
छोड़ती है
प्रश्न जलते
घिनघिनाते,
भिनभिनाते ।
ये हवा जो
दक्षिणी है
दे रही
उत्तर विषैले
करकराते,
कसमसाते ।

इस हवा का
हुक़्म है
भर-भर समेटो ।

हाथ खा लो
पाँव खा लो ।
धूप खा लो
छाँव खा लो ।
भूख का हर
दाँव खा लो ।
शहर खा लो,
गाँव खा लो ।
ये हवा है
श्याम फंगस
छोड़ती है
प्रश्न गलते
बिलबिलाते
कुलबुलाते ।
ये हवा,जो
श्वेत फंगस
दे रही
उत्तर नशीले
मदमदाते
नसनसाते ।

इस हवा का
हुक़्म है
चर-चर समेटो

नाक काटो,
कान काटो ।
बढ़ रहा, वो
मान काटो ।
आन काटो,
बान काटो ।
चढ़ रही, वो
शान काटो ।
एक नारंगी
हवा है
छाँव इसकी
प्रश्न पलते
मिनमिनाते
गिड़गिड़ाते ।
एक हरियाली
हवा है
दाँव इसके
तल्ख़ उत्तर
कटकटाते
मरमराते ।

इस हवा का
हुक़्म है
मर-मर समेटो ।

— ईश्वर दयाल गोस्वामी
छिरारी (रहली),सागर
मध्यप्रदेश ।

Language: Hindi
Tag: गीत
8 Likes · 8 Comments · 192 Views
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