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Jun 5, 2022 · 1 min read

हम पर्यावरण को भूल रहे हैं

वंशों से जो मिलता आया
हम सदाचरण वो भूल रहे हैं
प्राणवायु मिलती है जिससे
हम पर्यावरण को भूल रहे हैं
प्राणवायु मिलती़…………
दोहन कर रहे नासमझी मे
सभ्यता संस्मरण भूल रहे हैं
प्राणवायु मिलती………….
माँ जैसा आँचल जीवों का
वो शुभ्र आवरण भूल रहे हैं
प्राणवायु मिलती………….
खाते सौगंध बचाने की जो
वो लोग प्रण को भूल रहे हैं
प्राणवायु मिलती………….
“विनोद”लालची दूनियाँ में
सब जीवन-मरण भूल रहे हैं
प्राणवायु मिलती………….

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