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16 Jun 2022 · 5 min read

हंसगति छंद , विधान और विधाएं

हंसगति छंद ,(11 ~ 9 ) 20 मात्रिक छंद है।
दोहा का सम चरण + 3 2 4 अर्थात चरणांत सभी प्रकार के चौकल से
चार चरण , दो दो चरण. या चारों चरण तुकांत |

मात्रा बाँट दोहे के सम चरण जैसा यानी अठकल + ताल (21) है।
(अठकल में 4+4 या 3+3+2 दोनों हो सकते हैं।)

कुछ विद्वान प्रथम यति में त्रिकल को अनिवार्य मानते हैं मगर दोहा के सम चरणान्त जैसा २१ की बाध्यता नहीं मानते हैं |
(पर हमारा व्यक्तिगत अभिमत है कि दोहे के सम चरण की भाँति 11वीं मात्रा पर 21 की यति बहुत सुंदर लय देती है जैसे दोहा छंद में देती है )

9 मात्रिक (यति के बाद) मात्रा बाँट 3 + 2 + 4 है।
अर्थात
*यति के पहले और बाद में त्रिकल अनिवार्य है।

यति के बाद 9 मात्रा में त्रिकल में 21, 12, 111 तीनों रूप,
एवं द्विकल के 2, 11 दोनों रूप मान्य हैं।
इसी तरह चतुष्कल के 22, 211, 112, 1111 चारों रूप मान्य हैं

पर कुछ विद्वान इस छंद का चरणांत 211 से ही करना सही मानते हैं, तो कुछ चरणांत दो लघु एक दीर्घ से ही करना सही मानते हैं तो कुछ दो दीर्घ से ही सही मानते हैं।

ले देकर सारांश यह है कि हंसगति छंद को सबने अपने हिसाब से परिभाषित किया है | हम किसी के लेखन को गलत नहीं कह रहे हैं, सभी का अपना ज्ञान अनुभव लेखन है , सभी का सम्मान है।

पर हम 11 वीं यति गाल से ( दोहे के सम चरण जैसी ) व चरणांत सभी तरह के चौकल से उदाहरणार्थ सृजन लिख रहे हैं |

हंसगति छंद – 11 – 9
दोहा का सम चरण + 324

खिड़की-सी बनियान , फटी है चड्डी |
मजदूरों का स्वेद, दिखे तन हड्डी ||
गिरा खून मजदूर , आह भी मरती |
नक्शा हिंदुस्तान, बनाती धरती ||

देश प्रेम की बात , सभी समझाते |
दो रोटी का ठौर , नहीं बतलाते ||
बुझा रहा दिन रात , जहाँ पर चूल्हा |
नेता उस घर आज , मोड़ता कूल्हा ||

पढ़े लिखे मजदूर , समझते मौसम |
है चुनाव का दौर , भरे सब कौरम ||
लेकर जाए वोट , नहीं फिर आते |
कहे पिताजी- मात् , सभी गुन गाते ||

रोज कमाकर शाम , पेट को भरते |
हर पल जीते लोग , साथ में मरते ||
फाके को मजबूर, बिछौना गिट्टी |
मजदूरो‌ का हाल , जानती मिट्टी ||

जिस दिन मिले न काम , भूख को मारे |
पानी पी आराम , गिने सब तारे ||
शासन का फरमान , हमीं हैं रक्षक |
डसते है‌ं मजदूर , सभी‌ बन तक्षक ||

सच्ची कहता बात , सामने देखा |
कैसे – कैसे लोग , लाँघते रेखा ||
नेता करते लूट , सभी चुप रहते |
हम सब रहते मौन, नहीं कुछ कहते ||

प्रजातंत्र है यार, सभी अब जागो।
अंतस कि तुम नींद, इसी क्षण त्यागो।।
मिलो मचाओ शोर, चोर सब भागे।
करें राष्ट्रहित बात, बढ़ें हम आगे।।

विनय. हमारी आज , छोड़कर नारे |
करिए इनसे बात , देखकर द्वारे ||
मचा रहे जो शोर , “हमीं हैं रक्षक” |
दे जाते हैं दंश , वही बन तक्षक ||

अजब गजब है दौर , सभी अब नेता |
लेकर सेवा भाव , बने‌‌ युग त्रेता ||
कथनी करनी दूर , सभी हैं पंडा |
अपना-अपना राग , अलग है झंडा ||

किसको दे हम दोष , सभी हैं आला |
शूरवीर के पूत , सभी हैं भाला ||
कहे भारती मात , ‌युगों को देखा |
रावण फिर से आज , लाँघते रेखा ||

सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~
हंसगति छंद ( मुक्तक )

आंँखें निकली चोर, नहीं कुछ कहतीं |
कैसा है इकरार, जुबानें कँपतीं |
बदल गया है कौन , बहस से डरते ~
खारिज करने दोष , अदालत लगती |

कैसा साधा मौन , नहीं जो बोलें |
अपने मन का भेद , किसी से खोलें |
सोचे सदा सुभाष , उन्हीं का होकर ~
पर वह हमको देख , निगाहें तोलें |

अंधों मे सरताज बने जब काने ,
कंकण का है रूप सलोने दाने ,
कागा गाए राग सुने जब कोयल –
गर्दभ कुर्सी लाभ गए है पाने |

दिखती उल्टी चाल गधों की बस्ती ‌,
अजब चढ़ी है आज ,सभी को मस्ती ,
बोलो नहीं सुभाष, झुके सब घोड़े ~
बनी आज लाचार , दिखी सब हस्ती |

पहलबान का आज , तमाशा लेखा ,
गीदड़़ की ललकार , भागते देखा ,
लोकतंत्र है यार नहीं कुछ मुश्किल ~
हवा उड़ाती धूल , लखन की रेखा |

सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
गीत , आधार हंसगति छंद

अपनी ढपली राग , जोर से बजता | (मुखड़ा)
मैं करता उपकार , जमाना कहता || (टेक)

भरे पड़े हैं लोग , कहानी कहते | (अंतरा)
कथनी करनी भिन्न , नीति पर चलते ||
मतलब का संसार , सयाने मिलते |
ऊपर करते प्यार , हृदय से जलते ||

नहीं प्रेम का पुष्प , कहीं पर उगता | (पूरक)
मैं करता उपकार , जमाना कहता ||(टेक)

जगह- जगह पर लोग , करें अब बातें | (अंतरा)
किनकी कैसी रार , कहाँ पर घातें ||
चालबाज आवाज , किधर से निकले |
पता नहीं है यार , उधर क्या पिघले ||

उड़ा धुँआ है आज , यही सब लखता | (पूरक)
मैं करता उपकार , जमाना कहता ||(टेक)

सबका अपना मान , सभी हैं जंगी | (अंतरा)
अपना – अपना ठोर , बने हैं रंगी ||
सबको करे प्रणाम , ‘सुभाषा’ आकर |
मेटे सभी मलाल , निकट वह जाकर ||

जो है चतुर सुजान , वही अब खपता |(पूरक)
मैं करता उपकार , जमाना कहता ||(टेक)

सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अपदांत गीतिका , आधार हंसगति छंद ::–

स्वर जिनसे है दूर , सुनाते गाने |
तानसेन के बाप , लगे बतलाने ||

लगे पकड़ने सांँप , जानकर बिच्छू ,
अंधों में सरताज , बने हैं काने |

बनते है रँगदार , रंग सब फीके ,
कहना है बेकार , खुदा ही जाने |

चलते उल्टी चाल , सही को छोड़ें ,
शतरंजों के बाज , हारकर माने |

लड़ने को तैयार , बने हैं सानी ,
तोड़े सकल समाज, बिखरते दाने |

सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~

गीतिका , आधार छंद हंसगति

काबू में हालात , सुनायें नेता |
कागज पर दिन -रात , बतायें नेता |

मेहनतकश मजदूर ,काम को खोजे ,
सहता सबकी घात , रुलायें नेता |

झोपड़ पट्टी वास , गिने वह तारे ,
करें वोट की बात , जगायें नेता |

खूब जताते नेह , चुनावी मौसम ,
अपने हाथों भात , खिला़यें नेता |

सभी करें उपयोग , दाम भी देकर ,
रस में मदिरा जात , पिलायें नेता |

कहे सुभाषा आज , सम्हलना सीखो ,
पग- पग पर दें मात, झुकायें नेता |

नहीं आचरण शुद्ध , बुद्ध सब बनते ,
भारत के बन तात , नचायें नेता |

सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~

गीतिका , आधार छंद हंसगति

अपनी वह मुस्कान , बतायें सस्ती |
गाकर अपनी तान , सुनायें बस्ती |

करते रहते खोज, आँख. को फाड़े ,
चमचे करें बखान , जतायें बस्ती |
,
कितने बेईमान , नहीं कह सकते ,
पर देते अनुदान , गिनायें बस्ती |

पूरे तिकड़मबाज , रायता फैला ,
करे न कोई पान , सुलायें बस्ती |

बनते है श्रीमान , सभी से आला ,
उल्टे- सीधे ब्यान , नचायें बस्ती |

तरह-तरह के लोग , सुभाषा देखें ,
अपना- अपना बान , चलायें बस्ती |

काम मदारी छाप , नजारा देखो ,
उगा रात में भान , जगायें बस्ती |

सुभाष ‌सिंघई
~~~~~~~~~~~

गीतिका , आधार छंद हंसगति
मात्रा भार 11 -9
मापनी (दोहे का सम चरण + 324
समांत-आर, पदांत-नहीं अब कविता

चारण का उपहार , नही अब कविता |
नारी का शृंगार , नहीं अब कविता ||

ऱहता है संदेश , भाव‌ ‌ के अंदर ,
कंगन चूड़ी प्यार , नहीं अब कविता |

देश प्रेम की बात , कहे वह खुलकर ,
कायरता की धार , नहीं अब कविता |

बलशाली है शब्द , चोट भी करते ,
टूटी सी तलवार , नहीं अब कविता |

पौरुषता प्रतिमान , दिखाई देते ,
दीन हीन लाचार , नहीं अब कविता |

सिंघासन पर बैठ , न्याय भी करती ,
चारण जैसा भार , नहीं अब कविता |

लिखता यहाँ सुभाष , सामने आकर ,
छिपकर बैठे द्वार , नहीं अब कविता |

सुभाष ‌सिंघई

हंसगति गीतिका

मैं लिखता हूँ गीत , उन्हें समझाने |
अब भी करता प्यार, लगा बतलाने ||

तन्हाई में शब्द , सिसककर रोते ,
कागज पर वह आज , बने दीवाने |

जब तक थी वह , मीत , गीत की रेखा ,
अब सब लय सुर ताल , बहकते जाने |

बहुत सम्हाली बात , बाँधकर मुठ्ठी ,
खुला एक दिन हाथ , विखरते दाने |

रोता नहीं सुभाष , याद में जीता ,
रखता हरदम आस , लगन है पाने |

दूरी को मजबूर , मानता जग में ,
लिखता फिर भी आज , मिलन के गाने |

चला मुसाफिर आज , मिलेगें कल भी ,
तब जानेगे हाल , सभी उलहाने |

#सुभाष_सिंघई , एम. ए. हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र ,
निवासी जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र०

Language: Hindi
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