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Dec 29, 2021 · 7 min read

स्वर्गीय रईस रामपुरी और उनका काव्य-संग्रह एहसास

पुस्तक समीक्षा
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*स्वर्गीय रईस रामपुरी और उनका काव्य-संग्रह “एहसास”*
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*”अपने लायक भतीजे श्री रवि प्रकाश के लिए ” -* -इस पंक्ति के साथ स्वर्गीय श्री रईस रामपुरी ने 14 फरवरी 1991 को देवनागरी लिपि में प्रकाशित अपना उर्दू काव्य संग्रह *एहसास* मुझे भेंट किया था । संयोगवश उपरोक्त पंक्ति उर्दू में लिखी गई थी तथा उर्दू में ही श्री रईस रामपुरी के हस्ताक्षर तथा तिथि अंकित थी।
जब भी मैं पुस्तकों की अपनी अलमारी को खोलता था और *एहसास* पर नजर जाती थी ,तब मन में यह विचार उठता था कि इस पंक्ति में क्या लिखा हुआ है ? इसे किसी से पढ़वा कर देखा जाए । मुझे अनुमान भी नहीं था कि मेरे लिए *अपने लायक भतीजे* शब्द का आत्मीयता से भरा हुआ प्रयोग श्री रईस रामपुरी साहब ने किया होगा । यह तो जनवरी 2021 के आखिरी दिनों में जब मैंने गूगल ऐप के माध्यम से उर्दू से हिंदी अनुवाद का प्रयास करना शुरू किया। तब मेरे दिमाग में आया कि क्यों न इसकी शुरुआत रईस रामपुरी साहब की हस्तलिखित पंक्ति से ही कर दी जाए । गूगल ऐप का अनुवाद बचकाना और बेतुका था ।मैं उससे संतुष्ट नहीं था । फिर मैंने सटीक अनुवाद के लिए विद्वानों की मदद ली और तब मुझे पता चला कि रईस रामपुरी साहब ने मेरे लिए *अपने लायक भतीजे* विशेषण से मुझे आत्मीयता भाव प्रदान किया था । अब रईस रामपुरी साहब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन मैं उनकी पावन स्मृति को शत-शत नमन करता हूँ।
*एहसास* को पढ़ने के बाद मैंने उसकी समीक्षा लिखी थी तथा वह *?9 मार्च 1991?* के *?सहकारी युग हिंदी साप्ताहिक?,* रामपुर के अंक में प्रकाशित हुई थी । प्रकाशित समीक्षा इस प्रकार है:-

*समीक्षा : एहसास (काव्य संग्रह)*
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रईस रामपुरी मूलतः वेदना के कवि हैं । कविता उन की संवेदनाओं और भावनाओं की अभिव्यक्ति का एक माध्यम है । इन कविताओं में प्रेम के अनेक चित्र हैं तो दैहिक सौंदर्य की नश्वरता का बोध भी इन में है। वह प्रेम बहुधा सारी मानवता से प्रेम में बदल जाता है और सारी घरती का दर्द अपने में समेटकर मनुष्य – मात्र की व्यथा बन जाता है। मनुष्यता की खोज रईस रामपुरी के काव्य की एक प्रमुख प्रवृत्ति है । उनकी औपचारिक शिक्षा मात्र हाई स्कूल तक हुई ,मगर मानव-मात्र से प्रेम का पाठ उन्होंने भरपूर सीखा है।1930 में रामपुर में जन्म लेकर उन्होंने जिस प्रकार से साम्प्रदायिक दंगों के दौरान और उसके बाद भी खुद को एकता के मिशन के लिए समर्पित – सा कर दिया है, उससे उनका कवि उन के व्यक्ति रूप से एकाकार होकर और भी आकर्षक हो गया है। “एहसास” उनका देवनागरी लिपि में प्रकाशित उर्दू काव्य संग्रह है जिससे हिन्दी जगत उनकी काव्यात्मक प्रतिभा से परिचय पा सका है ।
रईस रामपुरी को रामपुर से लगाव है । यह उचित भी है क्यों कि जन्मभूमि का आकर्षण बेमिसाल होता है और दुनिया के हर प्रलोभन से परे होता है । देखा जाए तो अपने नाम के साथ *रामपुरी* शब्द जोड़कर वह अपने इसी भूमि-गौरव को अभिव्यक्ति दे रहे हैं । उनकी निम्न पंक्तियाँँ दृष्टव्य हैं :

*कैसे – कैसे शहर देखे ऐ रईस ।*
*है मगर अपना वतन अपनी जगह ।।*

रईस रामपुरी दर्द के शायर हैं । वह दर्द में जीते हैं । दर्द को पीते हैं। इतना ही नहीं, वह दर्द का स्वागत भी करते हैं । जीवन में गम न हों, तो वह उस जीवन को निस्सार मानते हैं। उनका मत है कि दुख ही व्यक्ति को नया जीवन, नया हौसला देते हैं । उन्होंने लिखा है :-

*गम को अस्ले- हयात कहते हैं ।*
*गम से घबरा रहा है दीवाने ।।*

किन्तु व्यक्तिगत दुख को अस्ले हयात यानि वास्तविक जीवन कहने वाला यह शायर समष्टिगत दुख की व्यापकता और तीव्रता से व्याकुल हो उठता है। समाज दुख में डूबे,यह उसे असह्य है। व्यक्तिगत दुख आदमी को फौलादी बनाता है मगर समाज की जिन्दगी दुख में डूबी रहे, उसमें उजाले की सुखी किरणें प्रवेश ही न कर पाएँँ और यह सिलसिला सदियों तक चलता रहे-यह कटु स्थिति शायर को अस्वीकार है । वह लिखते हैं :

*लम्हे सदियों में हो गए तब्दील ।*
*खत्म कब गम का सिलसिला होगा ।।*

उपरोक्त पंक्तियों में एक वेदना है धरती की सताई जा यही इसानियत के प्रति। भारत की किस्मत के अभी तक बन्द दरवाजों को खोलने की आकुलता उनके मन में है । कुछ ऐसा ही कि जैसी किसी ने कही भी थी कि आजादी आधी रात को मिली और सुबह अभी तक नहीं हुई।
नहीं सोचो, नहीं महसूस करो तो दुनिया का गम किसी की जिन्दगी को भीतर ही भीतर दीमक-सा नहीं चाटता । किसी ने कहा था कि सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है। रईस रामपुरी ने बहुत खूब लिखा है कि हर किसी के गम को अपना गम महसूसना ही सच्ची जिन्दगी है :

*हमारी उलझनें यह हैं कि हम महसूस करते है ।*
*किसी का गम भी हो अपना ही गम महसूस करते है ।।*

विचार को व्यवहार के स्तर पर उतारने के कायल रईस रामपुरी सिर्फ सोचने-विचारने या महसूस करने तक सिमटने को पर्याप्त नहीं मानते । वह मानते हैं कि महज सोचना काफी नहीं है । यानि जलसे, जलूसों, भाषणों, नारों से परिवर्तन नहीं होगा । वह लिखते हैं:
*अब हमें यह भो सोचना होगा ।*
*सोचते ही रहे तो क्या होगा । ।*

मनुष्यता के लोप का दर्द उनकी शायरी का एक कीमती पृष्ठ है । इंसानियत को जिन्दा देखने की उनकी कामना शक्ति कभी नहीं मरती । इसानियत कितनी भी नजरों से विलुप्त होने लगे, वह यही कहते हैं :

*अब तुझ में यह अन्दाज, ये तरकीब, ये बातें ।*
*दुनिया ! कभी तुझमें भी तो इन्सान रहे हैं ।।*

रईस रामपुरी भौतिकतावाद की चमक में अपनी आँखों की रोशनो नहीं खोते । वह प्रगति की दौड़ में भी मानवीय मूल्यों को कायम रखने की पक्षधरता पर टिके हैं। हर तरफ अंधी दौड़ती -भागती बदहवास भौतिकतावादी भीड़ की चकाचौंध वह देखते हैं और उफ! कहकर रह जाते हैं :

*वो रोशनी है कि कुछ भी नजर नहीं आता ।*
*ये कैसी सुबह मिली हमको रात के बदले ।।*

नेताओं पर व्यंग्य रईस रामपुरी की कलम से अछूता नहीं रहा । आखिर यही नेता तो हैं, जिन्होंने खादी के उजले वस्त्रों में भारत की आत्मा को लहूलुहान करके छोड़ दिया है । देश की बिगड़ती साम्प्रदायिक, आर्थिक और सामाजिक स्थितियों के लिए आज पदलोलुप स्वार्थी नेताओं से अधिक कोई जिम्मेदार नहीं है :-

*यह नए-नए-से रहबर, अगर आए जिक्र इनका ।*
*तो मुअर्रिखे-तबाही, इन्हें उम्र भर दुआ दे ।।*

क्या खूब कहा है रईस रामपुरी ने कि मुअर्रिखे तबाही यानि तबाही का इतिहास लिखने वाला नेताओं को भरपूर दुआ देगा ! इसी तरह नौखेज यानि स्वार्थी मार्गदर्शक नेताओं के बारे में उन्होंने एक जगह और लिखा है :

*इन्हें खुद-परस्ती से फुर्सत ही कब है ।*
*ये नौखेज रहबर न तेरे न मेरे।।*

धोखे अपनों से ही मिलते हैं। जब कोई निकट का व्यक्ति धोखा देता है तो आदमी को दर्द होता है क्योंकि उसे उससे ऐसी उम्मीद नही होती है । देखा जाए तो विश्वासघात वही कर सकता है, जिस पर कोई विश्वास करता हो । रईस रामपुरी यह बात देखिए कितनी पते की कहते हैं :-

*फरेब जानने वाले से खा गया हूँ रईस ।*
*कब आ सका है किसी अजनबी के धोखे में ।।*

रईस रामपुरी के काव्य में राजनीति, समाज, मनुष्यता आदि के
चित्र तो है ही, प्रेम की स्थिति के चित्र भी बहुत सुन्दर हैंं। देखा जाए तो जिस मासूमियत से भरे लड़कपन के प्यार को वह शब्दों से चित्रित करते हैं, वह उनकी अपनी ही विशेषता कही जा सकती है । उनकी प्रेमिका संकोची स्वभाव की है और उसे दुनिया की फिक्र भी है कि लोग क्या कहेंगे:-

*उनको मेरा वो बज्म में छुप-छुप के देखना ।*
*और यह भी देखना कि कोई देखता न हो ।।*

*उफ वो घबरा के चारों तरफ देखना ।*
*नाम लिख – लिख के मेरा मिटाने के बाद ।।*

मगर हालत यह है कि दोनों तरफ है आग बराबर लगी हुई ।
खुद प्रेमी की मन-स्थिति भी प्रेम से व्याकुल है और दुनिया की नजरों से बचे भी रहना चाहता है :

*हर इक से पूछता है उनका पता मगर ।*
*दिल यह भी चाहता है किसी को पता न हो ।।*

प्रेमिका के गेसू-ए-परीशां यानि बिखरे हुए बालों को देखकर कवि की कल्पना किस तरह सचेत हो उठती है ,उसकी मिसाल निम्न पंक्तियों में है :

*मालूम हुआ रात बिखर आई है जैसे ।*
*गेसू-ए-परीशां जो रईस उसने संवारे ।।*

यहाँँ काले बिखरे हुए बालों के कारण घनघोर रात की जो सृष्टि होती दिखाई गई है, वह अतिशयोक्ति जरूर है मगर कल्पना की उर्वरता के कारण काफी वजनदार बन गई है।
किन्तु दैहिक सौंदर्य में रईस रामपुरी का कवि सिमटने नहीं पाता । वह यौवन की क्षणंगुरता से परिचित है । उसे हुस्न और जवानी के चार दिन रहने की बात पता है और वह इसे बताता भी है :

*हुस्न पै ऐ इतराने वाले ।*
*देखा तो होगा सूरज ढलते ।।*

केवल सौंदर्य या जवानी ही नहीं, कवि को जीवन की नश्वरता का भी रह-रहकर आभास होता है । बुझते हुए चिरागों को देखकर उसे मृत्यु का चिर – सत्य स्मरण हो आता है और वह जीवन की क्षण भंगुरता में खो जाता है:

*सोचता हूँँ जब अचानक कोई बुझता है चिराग ।*
*जिन्दगी यह जिन्दगी क्या जिन्दगी कुछ भी नहीं ।।*

निष्कर्षतः रईस रामपुरी बहुआयामी दृष्टि के धनी कवि हैं। उनकी कविता – सृष्टि का मुख्य माध्यम गजलेंं हैं । उनके शेर जिन्दगी के विविध पहलुओं को छूते हैं । उसमें जीवन के राग-रंग हैं, उदासी है, दर्द है, विद्रोह है और तड़प है । वह मानवता के उपासक हैं । वह दैहिक सौंदर्य के आराधक हैं तो देह की नश्वरता के गायक भी । उनकी रचनाशीलता को रामपुर की सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता क्यों कि वह *रामपुरी* भले हों, मगर ऐसे *रईस* हैं जिसके दिल का हर कोना सारी दुनिया के गमों को अपने में समेटे हुए है । उनकी शायरी उनके व्यक्तित्व का स्पर्श पाकर और भी जीवन्त हो उठती है और उनका जीवन उनके काव्य में ढलकर बहुत स्पष्टता से मुखरित हो उठता है ।
“””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””
*लेखक : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
मोबाइल 99976 15451

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