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Jan 22, 2022 · 6 min read

स्वयं में एक संस्था थे श्री ओमकार शरण ओम

*संस्मरण/श्रद्धांजलि*
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*स्वयं में एक संस्था थे श्री ओमकार शरण ओम*
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श्री ओमकार शरण ओम नहीं रहे । 24 अगस्त 2021को यह नश्वर संसार छोड़ कर चले गए। रामपुर के सार्वजनिक जीवन में कई दशकों तक “रामपुर समाचार” हिंदी साप्ताहिक के प्रकाशन और संपादन के द्वारा पत्रकारिता के क्षेत्र में आपका अच्छा बोलबाला रहा था। नियमित रूप से पत्र प्रकाशित होता था तथा उसमें स्थानीय कवियों और लेखकों को अच्छा प्रोत्साहन मिल जाता था । आपने हिंदी दैनिक “राम रहीम” के प्रकाशन का दुस्साहस भरा कार्य भी अपने हाथ में लिया था । पत्र को आप ने जोर-शोर से प्रकाशित किया । लेकिन पत्रकारिता की प्रतिद्वंदिता में अखबार सफल नहीं रहा ।तो भी इतना तो स्पष्ट है कि श्री ओमकार शरण ओम साहस से भरे हुए , नए प्रयोगों को करने में रुचि रखने वाले तथा एक सक्रिय सामाजिक जीवन जीने वाले जीवट से भरे व्यक्ति थे।
1998 में उनके पहले काव्य संग्रह की भूमिका लिखने का सौभाग्य उन्होंने मुझे दिया ,इसके लिए मैं उनका कृतज्ञ हूँ । प्रस्तुत है समीक्षा जो श्री ओमकार शरण ओम (जन्म 30 अप्रैल 1937) की पुस्तक “धड़कन” में भूमिका के रूप में प्रकाशित हुई थी ।
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पुस्तक का नाम : धड़कन (कविता संग्रह)
कवि का नाम : ओमकार शरण ओम
पता : शांति निवास ,कैथवाली मस्जिद ,रामपुर (उत्तर प्रदेश)
प्रकाशन वर्ष : 1998 ईस्वी
प्रकाशक : शांति प्रकाशन ,शांति निवास ,कैथ वाली मस्जिद, रामपुर (उत्तर प्रदेश)
समीक्षक : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा ,रामपुर (उत्तर प्रदेश) मोबाइल 999761 5451
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*सत्य शिव सुंदर के उपासक कवि ओमकार शरण ओम*
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बचपन में कहीं किसी कवि सम्मेलन में, संभवतः रामपुर प्रदर्शनी कवि सम्मेलन में, श्री ओमकार शरण ‘ओम्’ को काव्य-पाठ करते सुना था। तभी से एक कवि के रूप में उनकी छवि मन पर अंकित हो गई। उनका यह काव्यात्मक रूप हर जगह देखने को मिला। श्री ओम् जी हिन्दी साप्ताहिक “रामपुर समाचार” के सम्पादक हैं और इस साप्ताहिक द्वारा जहाँ जानकारीवर्धक समाचार पाठकों को परोसे जाते हैं. वहीं इसके 26 जनवरी और 15 अगस्त के अंकों के सम्पादकीय विशेष रूप से श्री ओम् जी के भावुक हृदय से ओतप्रोत अभिव्यक्ति के कारण सहज ही ध्यान खींच लेते हैं। रामपुर समाचार के माध्यम से जनता को टेलीफोन डायरेक्टरी उपलब्ध कराने का सेवा कार्य तो उनका महत्वपूर्ण योगदान है ही, व्रत-उत्सव आदि निर्णयपत्र छापकर भी जनता की सेवा वह बराबर करते रहे। ओम् जी का रामपुर के सार्वजनिक जीवन, विशेषकर हिन्दी जगत में, सबसे महत्वपूर्ण कार्य “हिन्दी दैनिक राम रहीम” का प्रकाशन रहा। यह एक अत्यन्त महत्वाकांक्षी कार्य था। अखबार शुरु में अच्छा चला, मगर फिर एक दिन सहसा यह अतीत का विषय बन गया। राम रहीम के प्रकाशन की असफलता केवल ओम् जी की ही क्षति नहीं है, यह रामपुर के सम्पूर्ण समाज, विशेषकर हिन्दी जगत की क्षति है। बहरहाल इन सब बातों से जाहिर है कि ओम् जी कितनी बड़ी जोखिम उठाने की प्रवृत्ति रखते हैं, कितने सक्रिय हैं और किस प्रकार वह एक ऐसी प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं कि जो कुछ न कुछ सामाजिक क्रियाकलाप किए बिना नहीं रह सकते।
बासठ वर्ष की आयु में अब जबकि ओम् जी ‘धड़कन’ शीर्षक से अपनी महत्वपूर्ण कविताओं का संग्रह निकाल रहे हैं, तो यह इस बात का ही प्रमाण है कि उनका दिल बना ही इस मिट्टी का है कि जो धड़के बिना रह ही नहीं सकता। श्री ओमकार शरण ‘ओम्’ मूलतः गीतकार हैं, यद्यपि विचाराभिव्यक्ति को पैनापन प्रदान करने के लिए उन्होंने अपनी रचना-यात्रा में तुकान्त और अतुकान्त कविताओं का भरपूर प्रयोग किया है। गद्य-काव्य उनके रचना-संसार में बहुलता से देखने को मिलता है। कवि की भाषा शुद्ध परिमार्जित हिन्दी है। प्रवाह को बनाए रखने के लिए अंग्रेजी के “बूथ कैप्चरिंग ” जैसे शब्दों के प्रयोग से कवि ने परहेज नहीं किया है। इससे निश्चय ही अभिव्यक्ति में सहजता आई है ।
ताजमहल कृति शताब्दियों से प्रेमी हृदयों को आकृष्ट करती रही है। कवि को भी ताजमहल ने आकृष्ट किया, प्रमाण है चार पृष्ठ लम्बी कवि की ताजमहल कविता। ताजमहल के सम्बन्ध में मान्यता कि उसके भवन निर्माण में ऐसी खूबी है कि प्रतिवर्ष पानी की एक बूंद पता नहीं कैसे उस भव्य इमारत को पार करते हुए मुमताजमहल की समाधि पर टपक पड़ती है। इसी मान्यता को जो हर वर्ष देखने में आती है, कवि ने अत्यन्त भावुक होकर कविता में प्रस्तुत कर दिया है। प्रेम के प्रतीक ताजमहल को कवि की यह निश्चय ही एक कालजयी श्रद्धांजलि है:-

“यह महल देखने लोग यहाँ आते हैं और चले जाते
पर रुका न दो पल कोई भी, जो दो ही अश्रु गिरा जाते
जब मानव की निष्ठुरता को पत्थर ने देखा
पिघल पड़ा चुपचाप मौन रह-रहकर ही,
बस उस समाधि पर फिसल पड़ा
लेकिन मानव को पत्थर का, बेबस आँसू भी बुरा लगा
कोशिशें हजारों कर डालीं, पर वर्षी मेला लगा रहा।”
(पृष्ठ 42)
उपरोक्त पंक्तियों में कवि की गहरी अन्तर्दृष्टि के दर्शन होते हैं। चीजें जिस रूप में दीखती हैं, वैसे तो सभी देख लेते हैं, मगर कवि ने पत्थरों की आत्मा को बोलते सुना है और वह देखा है जो आम आदमी नहीं देख पाता।
हर कवि के रचना-संसार में कुछ पंक्तियाँ ऐसी होती हैं, जिन्हें पढ़कर सिर्फ संतोष ही नहीं मिलता बल्कि उन्हें बार-बार गाने को, गुनगुनाने को और दोहराने को जी चाहता है। मृत्यु के शाश्वत सत्य को स्वीकार करते हुए कवि का यह कालजयी गीत-अंश भला किसे अपने सम्मोहन-पाश में बांध नहीं लेगा :-

पता नहीं कब पंच-तत्व का कोई भी कण
अपने आप सिमटकर अपने में खो जाए,
और देह माटी की माटी में धरने को
अपने ही क्या सारा जग आतुर हो जाए।
इसीलिए बस एक पंक्ति को दोहराता हूँ
कल की जाने राम, आज तो जी भर गा लेने दो।
(पृष्ठ 3)
कवि की प्रारम्भिक रचनाओं में जहाँ भावनाओं की प्रधानता है, वहीं गीतात्मकता भी है। जैसे जैसे कवि ने जीवन अनुभवों से गुजरना शुरु किया, वैसे वैसे उसके तेवर वैचारिक स्वरूप लेते गए और विचार ही कवि पर हावी हो गया। कवि राष्ट्र जीवन के ज्वलन्त प्रश्नों का समाधान कविताओं में खोजता है, इतिहास पर दृष्टिपात कविता के माध्यम से करता है और जनता की असहाय स्थिति का चित्रण भी कविता के माध्यम से करता है। वह खुलकर अपनी बात रखता है। देखिए, कितनी सटीक हैं, सन् 98 के प्रथम दिवस पर कवि की यह भावनाएं :

“आज भी नवजात बच्चों का दूध पहरेदार डकार रहा है। विद्यार्थियों के विकास की किताबों का गधे भर बोझ मार रहा है। प्रतियोगिताओं में आरक्षण की लक्ष्मण देखा खींच दी गई है। नौकरियों में भाई-भतीजावाद ओर भ्रष्टाचार का बाजार गर्म है। राजनीति में दल-बदल, दलाली और ऊँची खरीद-फरोख्त का मर्म है। जो जहाँ बैठ गया है कई-कई पीढ़ियों तक हटना ही नहीं चाहता, जैसे उसके बिना यह देश निर्धन है, कंगाल है, बांझ है।”
(पृष्ठ 168)
उपरोक्त पंक्तियाँ निश्चय ही परिवर्तन की कामना से ओतप्रोत हैं, आम आदमी के पक्ष में लिखी गई हैं और उन मठाधीशों के खिलाफ जाती हैं जो सम्पूर्ण लोक जीवन में अन्याय और असमानता के पर्याय बन चुके हैं।
यह सही है कि वैचारिक प्रौढ़ता के धरातल पर कवि व्यवस्था-परिवर्तन की पथरीली राहों का पथिक बन कर उभरा है, मगर उसका कोमल, भावुक और प्रेमी हृदय भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। बल्कि कहना तो यह चाहिए कि कवि का यही रूप वह मनभावन मोह स्वरूप है जिसकी आधारशिला पर किसी कवि का जन्म होता है। श्रृंगार भी जीवन का एक पक्ष है और ऐसा पक्ष है कि जिसकी अनदेखी कतई नहीं की जानी चाहिए। कविता के सौंदर्य का रसपान करने के लिए आइए, गीत की निम्न पंक्तियों का आनन्द लें, जिनमें वियोग की पीड़ा को अत्यन्त कोमलता पूर्वक कवि ने क्या खूब अभिव्यक्ति दी है

“उस दिन मधुशाला के भीतर कोलाहल-सा पड़ा सुनाई
खाली जाम हाथ में ले-ले, देते थे सब तुम्हें दुहाई।
मुझे लगा जैसे मेरे ही लिए बनी तुम साकी-बाला
मैंने बिखरे बाल सँवारे, लेकिन तुमने बात न पूछी। ”
कवि में व्यवस्था-परिवर्तन की कामना अनेक स्थलों पर खुलकर सामने आई है । “अधिकारी” शीर्षक कविता में कवि कहता है :-
“क्या कोई इस व्यवस्था के सीने में ठोकेगा गहरी कील
या इसी तरह चलती रहेगी यह मक्कारी और डील
जब तक अधिकारी की परिभाषा नहीं बदलेगी ,अंधेरी नगरी चौपट राजा की कहानी यों ही चलती रहेगी।”
(पृष्ठ 175)

वर्तमान युग में कविता केवल कला के लिए या केवल मनोरंजन के लिए नहीं हो सकती। कविता की सार्थकता इसी में है कि वह समाज के लिए हो और समाज परिवर्तन के लिए हो। कविता की भूमिका समाज और व्यक्ति को सत्य, शिव, सुन्दर की ओर ले चलने की होनी चाहिए और प्रसन्नता का विषय है कि कवि श्री ओमकार शरण ‘ओम्’ की कविताएं इसी दिशा में सक्रिय दिखाई पड़ रही हैं।
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